ओम निश्चल आज हिन्दी साहित्य, खासकर हिंदी कविता की आलोचना-समालोचना के गतिशील और सतर्क परिदृश्य में एक चौकन्नी उपस्थिति के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं। वे पिछले 30 -35 वर्षों में हिन्दी भाषा और उसके साहित्य के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहते हुए दुनिया के बड़े कवियों और कविताओं के बरक्स हिन्दी में किए जा रहे स्तरीय कार्य को प्रस्तुत-प्रतिष्ठित करने में उदग्र भावुकता और व्यग्र तन्मयता से जुड़े-जुटे हुए हैं। उनकी समालोचनात्मक कृति 'कविता के वरिष्ठ नागरिक ' को पढ़ते हुए बार-बार भान होता रहा कि हिंदी के सर्वाधिक वयस्क और कदाचित काव्य-वयस्क और आज भी सक्रिय कवियों के काम-धाम को ठीक से जांच-परख कर उनके सृजन-वैभव की विशेषताओं को पाठक के सम्मुख रखना उनका ध्येय रहा है।
'कविता के वरिष्ठ नागरिक' हिंदी के वर्तमान सत्रह वयस्श्रेष्ठ कवियों रामदरश मिश्र, मलय, नरेश सक्सेना,अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, ऋतुराज, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, नंद किशोर आचार्य, विष्णु नागर,आलोक धन्वा, मनमोहन, उदयप्रकाश, दिनेश कुमार शुक्ल, विजय कुमार,ओम भारती व हेमंत शेष का आलोचनात्मक आकलन है जो आज भी रचनात्मक रूपसे सक्रिय हैं । ओम निश्चल पूरी विशदता के साथ अपने विवेचन में कवियों को सुदीर्घ एवं क्लोज़-अप शॉट दोनों में दिखाते हैं।
जिसका उद्देश्य कवि को उसके नैसर्गिक रूप में उपस्थित करपाठक को उससे अधिक तादात्म्य स्थापित करने का अवसर देने का है, जिससे कि पाठक के मन में कवि और उसकी कविता के प्रति विश्वसनीयता बढ़ सके। वे अपने विश्लेषण को वस्तुनिष्ठ तार्किकता से समलंकृत करने के लिए बहुत सायास ढंग से कवि की अनेक कविताओं का विस्तार से सुपाठ उपलब्ध कराते हैं, बाकायदा बताते हैं कि कवि का या उसकी किसी खास पंक्ति का प्रयोजन क्या है। वह केवल कवि को उसकी प्रवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में ही नहीं देखते, बल्कि कवि की प्रवृत्ति की प्रकृति या कि उसके उत्स की पूर्वपीठिका तक जाते हैं।
छियानवे वर्ष की आयु के रामदरश मिश्र हिंदी के साहित्य जगत में सर्वाधिक लम्बी अवधि से क्रियाशील रचनाकारों में शायद सबसे वरिष्ठ हैं। वे लगभग 65 -70 वर्षों से सक्रिय हैं। उनके बारे में लेखक उनके साहित्यिक अवदान की चर्चा इतने मनोयोग और आत्मीय संलग्नता के साथ करता है कि लगता है वह बहुत ममतालु भावसांद्रता और संस्मरणात्मकता से भरा हुआ है। रामदरश जी के विपुल लेखन का सार-संक्षेप दर्ज़ करते हुए लेखक ने ठीक ही उन्हें उद्धृत किया है ;
"छोड़ जाऊंगा कुछ कवितायें
कुछ कहानियां, कुछ विचार
जिनमें होंगे कुछ प्यार के फूल
कुछ तुम्हारे, कुछ उसके दर्द की कहानियां
कुछ समय -चिन्ताएं।"
इस अभिकथन में जो सादगी है, वह रामदरश जी को केवल जीवन में ही नहीं, रचना कर्म की निष्कृति में भी सरलता और निष्कपटता का वारिस बनाती है।
मलय हिंदी कविता के एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने उजास के एक से एक सुंदर और चमकदार बिम्ब बुने हैं जो सीढ़ी के साथ सम्पृक्त होकर अपनी सम्पूर्ण भास्वरता में व्यक्त होता है। जिसे वे 'उजेरे की नसेनी' कहना पसंद करते हैं। वे मुक्तिबोध की संगत में रहे हुए कवि हैं, लिहाज़ा वे मुक्तिबोध जैसे महावृक्ष के प्रभावों और रचनात्मक उद्दीपनों से स्वयं को बचा पाने की कोशिश में लगातार श्लथ नज़र आते हैं। ओम निश्चल ने अपने आलेख में मलय को मुक्तिबोध द्वारा ग्रंथिल मनोस्थितियों के चितेरे कवि के रूप में पहचाने जाने का उल्लेख किया है।
नरेश सक्सेना पर लिखते हुए उन्होंने यह रेखांकित किया है कि किस प्रकार उनका पाठ इतना रसभीना और रागमय है कि उसकी अंतर्ध्वनियों में पाठक के चित्त को परिष्कृत कर उदात्तता और सरस-संभाव्यता से भर देने की क्षमता को दूर से भी नोट किया जा सकता है। वे लक्षित करते हैं कि पदावलियों के नैपुण्य-पूर्ण संगुम्फन के चलते नरेश सक्सेना को पढ़ते हुए किसी भी काव्य रसिक में संस्कृत के महाकवि दण्डी के पद लालित्य की स्मृतियाँ अनायास ही कौंध जाती हैं।
अशोक वाजपेयी हिन्दी कविता की एक ऐसी समकालीन उपस्थिति हैं जिनकी चर्चा के बिना हिन्दी कविता का न तो निस्तार है, न ही अवस्थिति। पर उनकी कविता पर 'शब्दों से अथक गप ' शीर्षक चस्पा करते हुए ओम निश्चल ने 'गप' में क्यों रेड्यूस कर दिया है, पता नहीं चलता जब कि वे कहते हैं, "उनकी कविता समसामयिकता-समकालिकता का गान नहीं है ,वह शाश्वतता का सनातन उवाच है। "
लेखक ने मंगलेश डबराल पर लिखे अपने आलेख 'शोर को संगीत में बदलने की पेशकश' में मंगलेश की कविता में भावना की ऐन्द्रिकता और तार्किकता की स्पन्दनशीलता तथा उसकी प्रत्यभिज्ञा को पकड़ने की कोशिश की है। मंगलेश डबराल आज हिन्दी कविता के बेहतरीन कवियों में हैं जो शिल्प का न्यूनतम उपयोग करते हुए, लगभग सादी सी कविताएं अपनी अंतर्वस्तु की सघनता और सांद्रता से भावक को चकाचौंध से भर देते हैं।
राजेश जोशी आज की हिन्दी कविता के सबसे महत्वपूर्ण ,प्रामाणिक और विश्वसनीय हस्ताक्षरों में से एक हैं,कदाचित सर्वाधिक चमकदार और समुत्सवित। इसलिए वह आज जैसे हिन्दी कविता के सबसे मुखर, प्रामाणिक,भरोसेमंद और जीवंत मुहावरे बन गए हैं।
ऋतुराज पर अपने आलेख 'सभ्यता के नेपथ्य का नरक' में ओम निश्चल ऋतुराज की कविता के भीतर , बहुत भीतर एक गोताखोर की तरह जाते हैं और उनके समस्त कार्य-व्यापार, कविताई , भाषाई बुनावट, कहने के शिल्पगत परिष्कार और उनकी संवेदना और संवेद्यता की छोटी से छोटी चीज़ों पर बहुत गहरी नज़र से देखते-परखते मिल जाते हैं। वह ऋतुराज की कविताई के आस्वादन के लिए पाठक में एक ख़ास तरह की सेंसिबिलिटी की मांग के अपने आग्रह पर बने रहते हैं।
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ओम निश्चल के परम प्रिय और आत्मीय कवियों में से एक हैं। अपने आलेख 'शब्द के लिए जगह बनाता एक कवि में ओम निश्चल काफी सम्मान, कदाचित श्रद्धा को छूते सम्मान के साथ पढ़ने -बॉंचने की कोशिश करते नज़र आते हैं जो उनके विश्लेषण की वस्तुनिष्ठता पर भी प्रहार करता लगता है। पर उनके प्रति इस सराहना भाव से इतना तो तय है कि तिवारी वह विरल व्यक्ति हैं जिनमें गांधी थोड़ी-बहुत मात्रा में आज भी जीवित और संरक्षित हैं, विचार के स्तर पर, संस्कार के स्तर पर, जीवन शैली और खानपान-वेशभूषा के स्तर पर भी।
नन्द किशोर आचार्य पर ओम निश्चल का आलेख है, 'निज मन मुकुर '. नन्द किशोर आचार्य हिन्दी कविता में अपने में रमे रहने वाले कुछ उन विरल कवियों में हैं जो विचारों-विचारधाराओं की रस्साकशी में अपनी ऊर्जा खपाते हांफते -हलकान होते नहीं दीखते व अपनी एक ऐसी दुनिया में अधिक रमे रहते हैं जो अधिक अंतर्भूत और अन्तर्निहित है।
मनमोहन पर ओम निश्चल ने 'प्रतिरोध की काव्यात्मक फलश्रुति' शीर्षक आलेख में बहुत विस्तार से चर्चा न करके केवल उनकी कविता के क्रोमोज़ोम्स और डी एन ए की पहचान तक स्वयं को महदूद रखा है। मनमोहन की कविता का मन-मिजाज टटोलने के लिए उनकी एक कविता का अंश देखा जाना चाहिए : 'आधी से ज़्यादा आबादी/ जहाँ खून की कमी की शिकार थी / हमने वहां खून के खुले खेल खेले / हर बड़ा रक्तपात / एक रंगारंग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ / हमने खूब बस्तियां जलाईं /और खूब उजाला किया / और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा / देखो, दुनिया के लोगों / देखो हमारा जातीय गौरव। ' यहाँ मनमोहन जिस वितृष्ण कर देने वाली भयावहता का चित्र उकेर रहे हैं, उसमें तो वह सफल रहे हैं लेकिन ध्यान से देखने पर कविता में उनके स्फीति का शिकार हो जाने को भी अलक्षित नहीं किया जा सकता।
आलोकधन्वा पर लिखे 'कविता में वाचिक वैभव' में लेखक इस बात की पड़ताल करता है कि आलोकधन्वा क्यों अपनी कविता में आक्रोश को एक औजार की तरह इस्तेमाल कर समय को उसकी समूची कुरूपता के साथ उपस्थित करने का यत्न करते हैं।
' कविता के वरिष्ठ नागरिक' में उपर्युक्त कवियों-लेखकों के अतिरिक्त विजय कुमार,ओम भारती एवं हेमंत शेष के साहित्यिक अवदान की भी विस्तार से चर्चा की गयी है और उनके वैशिष्ट्य को इस आलोक में पकड़ने-परखने की कोशिश की है कि इन्होंने किस प्रकार हिन्दी कविता के वर्तमान परिदृश्य को अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाने में अपना योगदान दिया है।
कहना न होगा कि ओम निश्चल हमारे समय के एक महत्वपूर्ण आलोचक इसलिए नहीं हैं कि वे हमारे समय की कविता की महत्वपूर्ण आवाज़ों, उसकी अंतर्ध्वनियों, अनुगूंजों और अंतर्वस्तु के साथ ही उसकी मूल प्रेरणाओं और अंतिम निष्पत्तियों तक पाठक की यात्रा के अनवरत सहयात्री हैं। वह पाठक को जगह-जगह पर कविता के आस्वाद का मर्म समझाने के लिए न केवल उदाहरणों-उद्धरणों की व्याख्या करते हैं, वे पाठक के सुभीते के लिए हर क्षण तत्पर-सन्नद्ध मिलते हैं।
वे केवल यह नहीं बताते कि कौन सी कविता या उसकी कौन-सी पंक्ति महत्वपूर्ण है, वे यह सिद्ध करते हैं, ठीक वैसे जैसे गणित के सवाल या प्रमेय सिद्ध किये जाते हैं, कि वह कविता /पंक्ति क्यों, आखिर क्यों महत्वपूर्ण है। कार्य-कारणता की इतनी सघन पड़ताल जिसमें काफी कुछ वैज्ञानिक रीति-नीति का आभास सा होता है, ओम निश्चल के अतिरिक्त अन्य समकालीन आलोचकों में इतनी स्पष्टता के साथ मिलनी मुश्किल है।और शायद यही वह बिंदु है जो उन्हें एक अलग पहचान देता है. वस्तुतः ओम निश्चल कवि ,कविता और उसके पाठक के बीच किसी एलियन की तरह नहीं आते बल्कि वह हममें से ही कोई एक बनकर-रहकर कवि और कविता की हमारी समझ को और अधिक समावेशी और हृदयग्राही बनाते हैं।
( लेखक हिंदी के कवि, नवगीतकार एवं साहित्य के सुधी अध्येता हैं। )
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6 वर्ष पहले
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