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बारिश के पिंजड़े में: भाषा के चमत्कार पर नहीं, संवेदना की प्रामाणिकता पर टिका संग्रह

barish ke pinjre mein book review in hindi by praveen pranav
                
                                                         
                            किताब - बारिश के पिंजड़े में 
                                                                 
                            
लेखक - चन्दन सिंह 
समीक्षक - प्रवीण प्रणव 

कुछ कविताएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि धीरे-धीरे जिया जाता है। वे पहली ही बार में अपना सम्पूर्ण अर्थ नहीं खोलतीं। उनके भीतर छिपे अर्थ-संकेत, बिम्ब और भाव-स्तर पाठक से धैर्य की माँग करते हैं। हर पुनर्पाठ के साथ वे अपने किसी नए द्वार को खोलती हैं, और पाठक को अपने भीतर पहले से कुछ अधिक गहरे उतरने का निमंत्रण देती हैं। ऐसी कविताओं का सौन्दर्य उनके अर्थ की जटिलता में नहीं, बल्कि उनकी बहुस्तरीयता में निहित होता है। इसके विपरीत कुछ कविताएँ ऐसी भी होती हैं जिनकी भाषा अत्यन्त सरल होती है। वे अपने कथ्य को बिना किसी बौद्धिक आडम्बर के पाठक के सामने रख देती हैं, किन्तु उनका भाव-संसार इतना व्यापक और गहरा होता है कि प्रत्येक पुनर्पाठ पर वे भीतर किसी नई स्मृति को स्पर्श कर जाती हैं। हर बार वे मन में कोई नया दृश्य रचती हैं, किसी भूले हुए स्पर्श को पुनर्जीवित करती हैं, किसी पुराने दर्द को फिर से आवाज़ देती हैं या किसी अनाम सुख की हल्की-सी लहर भीतर जगा देती हैं। ऐसी कविताएँ पाठक से इसलिए बार-बार पढ़े जाने का आग्रह नहीं करतीं कि उनके अर्थ कठिन हैं, बल्कि इसलिए कि वे हर बार नए अनुभव में बदल जाती हैं। प्रत्येक पाठ में उनके शब्द वही रहते हैं, पर पाठक बदल जाता है; और इसी परिवर्तन के साथ कविता भी अपना नया रूप ग्रहण कर लेती है।

वरिष्ठ कवि चन्दन सिंह इसी दूसरी परम्परा के कवि हैं। उनकी कविता का संसार, भाषा के चमत्कार पर नहीं, संवेदना की प्रामाणिकता पर टिका है। वे पाठक को चकित नहीं करते, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर उतरते हैं। उनकी कविताएँ शोर नहीं करतीं, बल्कि स्मृतियों की तरह मन में बस जाती हैं। वे किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की उतावली नहीं दिखातीं; वे पाठक के भीतर प्रश्नों, चित्रों और अनुभूतियों का एक ऐसा संसार निर्मित करती हैं, जहाँ कविता समाप्त हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहता है। इसी कारण उनका काव्य-संग्रह ‘बारिश के पिंजरे में’ केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ प्रतीत होता है। यहाँ गाँव है, शहर है, विस्थापन है, स्मृति है, प्रेम है, मृत्यु है, भूख है, श्रम है, प्रकृति है, संगीत है, और इन सबके बीच सबसे अधिक उपस्थित है मनुष्य। ऐसा मनुष्य, जो अपनी समस्त कमजोरियों, करुणाओं, विडम्बनाओं और छोटे-छोटे सुखों के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है।

समकालीन हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवियों में शुमार प्रो. अरुण कमल ने इस संग्रह की भूमिका में जो लिखा है, वह वस्तुतः चन्दन सिंह की काव्य-दृष्टि का अत्यन्त सटीक मूल्यांकन है - चन्दन सिंह अतिशय भावप्रवण और विरल भाव-लोक के कवि हैं। सूक्ष्म, मसृण तंतुओं से बुनी हुई इनकी कविताएँ सामान्य जीवन प्रसंगों को अलौकिक आभा से आविष्ट करतीं एक समानान्तर संसार की सृष्टि करती हैं। ऐसे युग में जब अधिकांश कविताएँ वक्तव्य-आश्रित हों तब चन्दन सिंह की कविता बिम्बों के माध्यम से समतुल्य भाव की प्रस्तुति की प्रतिज्ञा से परिचालित होती है। इसीलिए वे सान्द्र, ऐन्द्रिक और धारोष्ण होती हैं। पूरा संग्रह घने, आर्द्र रूपकों और उपमानों से भरा है, जैसा कि 'भुट्टा' या 'मर्मज्ञ' सरीखी कविताएँ प्रमाणित करती हैं। चन्दन सिंह विलक्षण कवि हैं, चाक्षुष और श्रवण बिंबों के सहज स्थपति।” अरुण कमल का यह कथन केवल भूमिका में लिखा गया एक प्रशंसात्मक वक्तव्य नहीं है, बल्कि संग्रह के सम्यक् अध्ययन के बाद निकला हुआ निष्कर्ष है। वास्तव में जब पाठक इस संग्रह की कविताओं से होकर गुजरता है, तब उसे अनुभव होता है कि चन्दन सिंह का कवि-मन जीवन के अत्यन्त सामान्य दृश्यों में भी असामान्य अर्थ खोज लेता है। वे किसी बड़े वैचारिक उद्घोष की अपेक्षा एक छोटे-से दृश्य, एक मामूली वस्तु, किसी भूले हुए स्वाद, किसी साधारण मनुष्य या किसी क्षणिक अनुभूति के भीतर छिपे विराट मानवीय अर्थ को पहचानते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता पढ़ते हुए पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह किसी परिचित संसार में ही प्रवेश कर रहा हो।

इस संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसकी कविताएँ किसी एक भावभूमि में सीमित नहीं रहतीं। वे जीवन के विविध आयामों में विचरण करती हैं। कहीं भूख और अकाल है, कहीं विस्थापन की पीड़ा, कहीं प्रेम का रहस्य, कहीं मृत्यु का निजी सौन्दर्य-बोध, कहीं बाज़ारवाद की विडम्बना, कहीं श्रमिक जीवन की अनकही कथा और कहीं प्रकृति का इतना कोमल स्पर्श कि कविता पढ़ते-पढ़ते पाठक स्वयं उस दृश्य का हिस्सा बन जाता है। यही बहुवर्णी संवेदना इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है। संग्रह का सबसे मार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण खंड ‘कालाहाँडी’ है। यह केवल सात कविताओं का क्रम नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उस काले अध्याय की काव्यात्मक स्मृति है जिसे हम विकास की चमक के बीच अक्सर भुला देना चाहते हैं। ओडिशा का कालाहाँडी जिला 1980 के दशक में गरीबी, कुपोषण, बच्चों की बिक्री और भुखमरी से होने वाली मौतों के कारण राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया था। स्थिति इतनी भयावह थी कि बार-बार पड़ने वाले अकाल और भूख की त्रासदी को ही ‘कालाहाँडी सिंड्रोम’ कहा जाने लगा। विडम्बना यह है कि इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कभी यही कालाहाँडी इतना सम्पन्न था कि बंगाल के अकाल के समय उसने अकेले लगभग एक लाख टन चावल की आपूर्ति की थी। समय का यह निर्मम व्यंग्य भारतीय सामाजिक संरचना की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है।

चन्दन सिंह इन ऐतिहासिक तथ्यों को कविता में नहीं दोहराते। वे आँकड़ों की भाषा नहीं बोलते। वे उस भूख का चेहरा दिखाते हैं जो आँकड़ों में कभी दिखाई नहीं देती। पहली ही कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ पाठक को सीधे उस त्रासदी के बीच पहुँचा देती हैं - कैसा अभागा नाम है यह कालाहाँडी/ सुनते ही उदर में फैल जाता है अकाल/ जैसे खाया नहीं कई दिनों से/ कई दिनों से नसीब न हुआ हो पीने का पानी।” इन चार पंक्तियों में कवि ने केवल एक भूगोल का परिचय नहीं दिया, बल्कि एक पूरे इतिहास को मनुष्य के शरीर में रूपान्तरित कर दिया है। कालाहाँडी की सबसे बड़ी त्रासदी केवल भूख नहीं थी; उससे भी बड़ी त्रासदी थी भूख के कारण मनुष्य की अस्मिता का टूट जाना। पेट भरने के लिए लोगों ने अपने पशु बेचे, अपनी जमीन बेची, अपने घर बेचे और अन्ततः अपने बच्चे तक बेचने पड़े। सभ्यता के सारे आदर्श भूख के सामने किस प्रकार असहाय हो जाते हैं, इसका अत्यन्त मार्मिक चित्र ‘कालाहाँडी-6’ में उपस्थित होता है – “मुट्ठी भर भात/ और थोड़ा सा झोर के/ पेट में जाते ही/ वापस लौटने लगती है इंसानियत/ हर कौर के साथ/ थाली में जो जगह खाली होती है/ झलकता है वहाँ/ बेच दी गई बिटिया का चेहरा/ बकरियाँ/ पुरखों की निशानियाँ/ पानी की घूँट से/ कण्ठ नहीं/ भींगती है आँखें।” यह कविता केवल भूख की नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा के क्षरण की कविता है। ‘थाली में खाली जगह’ का बिम्ब असाधारण है। वहाँ भोजन का अभाव नहीं दिखाई देता, वहाँ एक बेची हुई बेटी का चेहरा दिखाई देता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही बाबा नागार्जुन की स्मृति ताज़ा हो उठती है। उनकी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ “कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास…” भारतीय कविता में भूख की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में गिनी जाती हैं। चन्दन सिंह उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं, किन्तु उनकी भाषा में करुणा के साथ एक गहरा दृश्य-बोध भी जुड़ जाता है। वे भूख का वर्णन नहीं करते; वे भूख को आँखों के सामने उपस्थित कर देते हैं। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।

चन्दन सिंह की कविता का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि वह अपने पाठक पर कोई विचार आरोपित नहीं करती। वह न तो घोषणा करती है, न नारा देती है और न ही किसी वैचारिक आग्रह के बोझ तले दबती है। वह धीरे-धीरे अपने दृश्य रचती है, अपने बिम्ब गढ़ती है और पाठक को इस प्रकार उस संसार में ले जाती है कि कविता समाप्त होने के बाद भी उसका प्रभाव देर तक बना रहता है। उनकी अनेक कविताओं में यह अनुभव विशेष रूप से मिलता है कि अंतिम दो-तीन पंक्तियाँ सम्पूर्ण कविता का अर्थ एकाएक किसी नए आलोक में उद्घाटित कर देती हैं। इस दृष्टि से उनकी काव्य-प्रविधि कहीं-कहीं गुलज़ार की प्रसिद्ध ‘त्रिवेणी’ की याद दिलाती है। त्रिवेणी की पहली दो पंक्तियाँ एक अर्थ-संरचना निर्मित करती हैं और तीसरी पंक्ति अचानक उस अर्थ को विस्तृत, परिवर्तित अथवा उलट देती है। चन्दन सिंह की कविताएँ त्रिवेणी नहीं हैं, उनकी संरचना भी उससे भिन्न है, किन्तु उनकी अनेक कविताओं के समापन में वही अप्रत्याशित प्रभाव दिखाई देता है। पाठक को लगता है कि कविता तो अभी समाप्त हुई है, जबकि वास्तव में वह उसके भीतर अभी शुरू हुई है। उदाहरण के लिए ‘तुम्हें सुनते हुए’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं “और सुनो,/ वहाँ एक कविता है/ जिसके मुँह में कोई शब्द नहीं।” इन तीन पंक्तियों में कविता का समूचा सौन्दर्य निहित है। यह निःशब्द कविता दरअसल मनुष्य के उन अनुभवों की कविता है जिन्हें भाषा कभी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती। इसी प्रकार ‘प्रेम कथा’ कविता का समापन है “और उसमें रहने वाला रहस्य शायद/ टीले से उतर शहर में चला आया हो/ घूमता घर-घर में झांकता/ किसी प्रेम कर रही बुरी लड़की की तलाश में।” विशेष रूप से ‘प्रेम कर रही बुरी लड़की’ का प्रयोग। यह प्रयोग पाठक को भीतर तक झकझोर देता है। समाज प्रेम करने वाली स्त्री को कितनी सहजता से ‘बुरी’ घोषित कर देता है, यह पूरा सामाजिक यथार्थ मात्र चार पंक्तियों में उद्घाटित हो जाता है। ‘पकने की गन्ध’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ अत्यन्त मार्मिक हैं “फिर भी कितना मुश्किल है/ यक़ीन कर पाना/ बिना माँ के भी/ कुछ पक सकता है।” यह कविता माँ की उपस्थिति को किसी भावुकता के सहारे नहीं, बल्कि जीवन के सबसे सामान्य अनुभव के माध्यम से अमर बना देती है। ऐसी अनेक कविताएँ इस संग्रह में हैं जहाँ समापन कविता का सबसे प्रभावशाली क्षण बन जाता है। पाठक कविता समाप्त करके पुस्तक बन्द नहीं करता; वह अनायास ही एक बार फिर आरम्भ से पढ़ना चाहता है। किसी भी श्रेष्ठ कविता की यही पहचान है कि वह अपने भीतर पुनर्पाठ की सम्भावना बनाए रखे।
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6 घंटे पहले

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