तालिबान की काबुल विश्वविद्यालय में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के बाद महिला शिक्षकों और छात्राओं में यह डर बढ़ता जा रहा है कि उन्हें फिर कभी स्कूल-कॉलेज नहीं जाने दिया जाएगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए शरीफ हसन और कोरा एंजलबर्श लिखती हैं कि विश्वविद्यालयों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी महिला अधिकारों को बड़ा झटका है। तमाम शिक्षक भी पढ़ाना छोड़ चुके हैं और देश से बाहर निकलना चाहते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक आधे से ज्यादा शिक्षक देश छोड़कर जा चुके हैं, जबकि बड़ी तादात में शिक्षकों ने अपना पेशा छोड़ दिया है, या छोड़ने का विचार कर रहे हैं। काबुल विश्वविद्यालय के एक पूर्व शिक्षक व पत्रकार समी महदी जो फिलहाल अंकारा, तुर्की में रह रहे हैं, उनका कहना है कि वहां इतना भय का माहौल है कि पढ़ना-पढ़ना नामुमकिन है। एजेंसी
बच्चे आधुनिक शिक्षा से दूर, रट रहे कुरान की आयतें
तालिबान की वापसी के साथ काबुल के आसपास मदरसों में सुबह साढ़े चार बजे से ही बच्चों की कोलाहल सुनाई देने लगी है। तालिबान राज में आधुनिक शिक्षा की बजाए धर्म का ज्ञान दिया जा रहा है।
बच्चे कुरान की आयतें रटते हुए सुनाई दे रहे हैं। मदरसे के अधिकतर लड़के गरीब परिवारों से हैं जिनका वास्ता आधुनिक शिक्षा से होने की उम्मीद कम है। बच्चों को अपना भविष्य तो नहीं पता लेकिन वे इतना जरूर जानते हैं कि मदरसे में धर्म की शिक्षा ही सबसे बड़ी शिक्षा है।
अमेरिकी सेना के केंद्रीय कमान के प्रमुख जनरल फ्रैंक मैकेंजी ने बुधवार को अमेरिकी संसद में प्रतिनिध सभा की सैन्य समिति को बताया कि अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार का पतन तालिबान और ट्रंप प्रशासन के बीच हुए दोहा समझौते के कारण ही हुआ।
जनरल ने कहा, अमेरिका ने एक तारीख तय कर दी और कह दिया कि हम जा रहे हैं। इससे अफगान सरकार और सेना मनोवैज्ञानिक स्तर पर खुद को असहाय महसूस करने लगी, जबकि उसे अमेरिका से सहायता की उम्मीद थी।
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, मैकेंजी ने कहा, अगस्त के अंत तक पूर्ण वापसी के वाशिंगटन के फैसले के चलते जैसे ही अमेरिकी सैनिकों की संख्या 2,500 से कम हुई अमेरिका समर्थित अफगान सरकार धराशायी होने लगी।
29 फरवरी, 2020 को दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ कि मई 2021 तक अमेरिका अफगानिस्तान से पूरी तरह निकल जाएगा। इस समझौते के तहत तालिबान अमेरिकी सैनिकों पर हमला नहीं करेगा।
इसके बाद तालिबान और अफगान सरकार के बीच शांति समझौते को लेकर प्रयास किए जाने थे, लेकिन यह मकसद हल हो पाता, उससे पहले ही सत्ता बाइडन के हाथों में आ गई और नए राष्ट्रपति ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर जोर देना शुरू कर दिया।
मैंकेजी ने कहा कि हमारे सैनिकों के बिना अफगान सरकार का धराशायी होना तय था, लेकिन बाइडन की तरफ से जिस तेजी से यह करने पर जोर दिया गया वह ताबूत में आखिरी कील साबित हुई।