वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि बात हो रही है, बीच का रास्ता निकाला जाए। मसाने की होली पर बीच का रास्ता नहीं हो सकता। काशी केयरलेस नहीं है केयर फ्री है। दिवंगत छन्नू लाल मिश्र भी दिगंबर में खेले होली... सभ्य मंचों पर, घरों में गाया। मणिकर्णिका पर बैठकर नहीं गाया। काशी के मूल चरित्र को जानने के लिए उसको पढ़ना जरूरी है। शिव का दूसरा नाम है अघोर। अघोर माने भय के उस पार ले जाने का नाम है अघोर। काशी की बीमारी यह है कि कुछ भी नया करें लेकिन नाम प्राचीन होना चाहिए। पंचगंगा पर नरगिस की माताजी गाती थीं। 600 साल पहले बनारस का भूगोल क्या है यही नहीं पता है लोगों को। इस शहर में नौ टोला था मुक्त विवि था। पारिवारिक लोगों का आना शुरू हुआ 15वीं शताब्दी के बाद, उत्सव मनाने की परंपरा बहुत बाद में हैं। अहिल्याबाई की कृपा से लोगों ने उत्सव मनाना शुरू किया। मणिकर्णिका पर सेल्फी ले रहे हैं यह शिव का अपमान है। हमें दूसरों की आस्था को चोट करने का अधिकार नहीं है। काशी में सबकुछ बहुत प्राचीन है ऐसा झूठ मत गढि़ए। यह एक नाम पर कायम नहीं रहा, 32 नाम है, हर कालखंड में नाम बदला है।