कुलदीप सिंह सेंगर प्रकरण को लेकर एक बार फिर उन्नाव का माखी गांव चर्चा में है। वर्ष 2017 से जुड़े इस मामले में पहले हाईकोर्ट से मिली जमानत, फिर पीड़िता के विरोध और धरना-प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत रद्द किए जाने तक, पूरा घटनाक्रम सियासत और न्याय की जटिलताओं से गुजरता रहा। अब सात साल बाद भी यह मामला गांव और जिले में बहस का विषय बना हुआ है।
मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए अमर उजाला की टीम माखी गांव पहुंची, जहां स्थानीय लोगों ने खुलकर अपनी राय रखी। गांव के कई लोगों का कहना है कि वे आज भी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को निर्दोष मानते हैं। उनका आरोप है कि शुरुआत से ही मामले में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और अब सच्चाई सामने आनी चाहिए।
स्थानीय लोगों ने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट को निष्पक्षता के लिए पीड़िता और कुलदीप सिंह सेंगर—दोनों का नार्को टेस्ट कराने पर विचार करना चाहिए, ताकि किसी भी कथित साजिश का पर्दाफाश हो सके। गांव की महिलाओं ने भावुक होते हुए कहा कि उनके विधायक को झूठे आरोपों में फंसाया गया है और न्याय प्रक्रिया में उनके पक्ष को पर्याप्त रूप से नहीं सुना गया।
इसी बीच कुलदीप सिंह सेंगर की दो बेटियां भी अपने पिता को निर्दोष साबित करने के लिए न्याय की चौखट पर हैं। उनका कहना है कि बचाव पक्ष के तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। माखी गांव से उठ रही इन आवाजों के बीच, सात साल बाद भी सवाल वही है—क्या इस मामले की पूरी सच्चाई अब सामने आएगी?