शुभम मिश्रा, बछरावां (रायबरेली)। सई नदी के किनारे लखनऊ, उन्नाव और रायबरेली की सीमा पर भवरेश्वर मंदिर है। बताते हैं कि यह मंदिर द्वापर युग का है। सावन में यह मंदिर लोगों का आस्था का बड़ा केंद्र होता है। दूरदराज से लोग मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैंं। मंदिर के पुजारी सुनील बाबा बताते हैं कि सावन के सोमवार को करीब दो लाख से अधिक भक्त भंवरेश्वर शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं। सुदौली निवासी महेंद्र कुमार बताते हैं कि लाक्षाग्रह में आग लगने के बाद पांडव हस्तिनापुर से अज्ञातवास में चले गए थे। इस दौरान पांडव घूमते घूमते बछरावां में सई नदी के किनारे पहुंचे था। मां कुंती प्रतिदिन शिव की पूजा करने के पश्चात ही जल गृहण करती थीं। तो ऐसे में सई के किनारे जब पांडव रुके तो मां कुंती की पूजा के लिए भीम ने शिलाखंड से शिवलिंग बनाया और मां कुंती ने उसका पूजन किया। तब पांडवों ने इस मंदिर को भीमेश्वर महादेव का नाम दिया। बताते हैं कि समय गुजरने के साथ यह शिवलिंग मिट्टी के नीचे दब गया। मुगल बादशाह औरंगजेब केे शासनकाल के दौरान एक दिन कुर्री सुदौली स्टेट की गायों में एक गाय महल की गोशाला नहीं लौटी तो उसकी पड़ताल की गई। पता लगा कि गाय एक जगह खड़ी होकर अपने थन से दूध गिरा रही है। यह सभी के लिए हैरतभरा था। तय किया गया कि जगह की खोदाई की जाए। इस पर एक चरवाहा फावड़ा लेकर खोदाई में जुट गया। इसी दौरान किसी पत्थरनुमा चीज से फावड़ा टकराया तो शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा अलग हो गया। इस पर खोदाई बंद कर दी गई। वहीं उसी रात तत्कालीन कुर्री सुदौली की महारानी को भगवान शिव ने स्वप्न में आदेश दिया कि मेरा शिवलिंग जो भीम ने स्थापित किया है। उसे निकलवा लो। सुबह होते ही महारानी सई नदी के किनारे पहुंची तो देखा कि एक शिवलिंग मिट्टी में दबा है। उसका एक तरफ का हिस्सा कट गया है। महारानी ने शिवलिंग का जितना हिस्सा जमीन से बाहर आ सकता था, उसके निकलवा कर वहां पर भव्य मंदिर बनवाया। उस दौरान मंदिर का नाम भीमेश्वर रखा गया। जब भीमेश्वर मंदिर की चर्चा फैलने लगी तो बात दिल्ली की गद्दी पर बैठे औरंगजेब तक पहुंची तो वह सेना लेकर बछरावां पहुंचा। इस दौरान उसके सिपाहसलारों ने शिवलिंग को नष्ट करने की कोशिश की। लोग बताते हैं कि करीब 60 फीट तक खोदाई करने के बाद भी शिवलिंग का दूसरा सिरा नहीं मिला। बल्कि सई नदी का पानी ऊपर आने लगा। यह देखकर औरंगजेब भी हैरत में पड़ गया। उसने शिवलिंग में जंजीरें बंधवा कर हाथियों से खिंचवाने का आदेश दिया। मंदिर के पुजारी सुनील बाबा बतातेे हैं कि उस दौरान भक्तों ने रक्षा की गुहार लगाई तो हाथियों ने जैसे ही जोर लगाया। वैसे ही मूर्ति के अगल-बगल से अरबों भंवरे निकल पड़े और फौज पर टूट पड़े। इस पर मुगल फौज भाग खड़ी हुई। इसके बाद औरंगजेब को माफी मांगनी पड़ी और उसने वहां पर मठिया स्थापित की। इस घटना के बाद से मंदिर का नाम भंवरेश्वर पड़ गया। बाद में सुदौली रियासत की ओर से मंदिर के क्षतिग्रस्त हिस्से को बनवाया गया। घाट नहीं छोड़ती सई नदी भंवरेश्वर मंदिर की खासियत यह है कि मंदिर के बगल से सई नदी बहती है और चाहे जितनी गर्मी पड़े, सई नदी का पानी मंदिर के घाट पर कम नहीं होता। इसी कारण यहां पर जाल लगाया है। पानी की गहराई बहुत अधिक है। जबकि सई नदी जिले के अन्य हिस्सों मेंं सूखी पड़ी हैं। यहां पर सई नदी गहरी होने के साथ बहाव में रहती हैं। सावन माह में भक्त सई नदी से पानी लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।