फिरोजाबाद के टूंडला में दशहरा व दुर्गा पूजा के बाद अब दिवाली त्योहारों का मौसम शुरू हो गया है। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में लोक परंपराओं का रंग भी गहरा होने लगा है। इन दिनों देहात के गांवों में टेसू और झांझी के तराने गूंज रहे हैं, जिसने पूरे माहौल को खुशनुमा बना दिया है। बच्चों द्वारा गाए टेसू के गीत सुन बुजुर्ग भी अपने बचपन में खो रहे हैं। टेसू और झांझी का यह पारंपरिक लोक पर्व मुख्य रूप से बच्चों का उत्सव है। शाम होते ही बच्चों की टोलियां घरों से निकल पड़ती हैं। लड़के टेसू (लकड़ी का पुतला या ढांचा) लेकर, तो लड़कियां झांझी (छिद्रयुक्त मिट्टी का कलश, जिसमें दीपक जलता है) लेकर घर-घर जा रहीं हैं। बच्चों की टोतली आवाज़ में गाए जा रहे टेसू और झांझी के लोकगीत और तराने सुनकर लोगों के हंसी के फव्वारे छूट रहे हैं। अपनी मासूमियत और बेबाक अंदाज में बच्चे गीत गाकर लोगों से उपहार या पैसे मांग रहे हैं, जिसे ग्रामीण खुशी-खुशी दे रहे हैं। बच्चों द्वारा गाए गीत, टेसू मेरा यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा.....टेसू-टेसू कहां चले....टेसू आयो, टेसू आयो, द्वार खड़े...बच्चों का यह उत्साह, हंसी और लोकगीतों का मधुर मिश्रण ग्रामीण अंचल में एक विशिष्ट और मनमोहक वातावरण बना रहा है। बड़े-बुजुर्ग भी इन बच्चों को देखकर अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं और बच्चों के साथ खुद भी टेसू के गीत गाते पैसे व अनाज दे रहे हैं।