अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की खुशी और आंदोलन के समय की स्मृतियां 59 वर्ष के धीरेंद्र की आंखों में साफ दिखाई देती हैं। बरेली के चौधरी मोहल्ला निवासी कारसेवक धीरेंद्र ने बताया कि वर्ष 1990 में वह बरेली कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई कर रहे थे। हिंदूवादी संगठनों के आह्वान पर शहर से कारसेवक अयोध्या जाने के लिए तैयार हुए। सभी युवा थे। कारसेवा के लिए जब वह अयोध्या जा रहे थे तो बहनों ने अंगूठे के रक्त से तिलक कर उनको विदा किया था। उस वक्त परिस्थितियां ऐसी थीं कि किसी को अंदाजा भी नहीं था कि जान बचेगी भी या नहीं। वहीं, सबके मन में यह संकल्प था कि मंदिर तो वहीं बनाएंगे। धीरेंद्र बताते हैं कि वे सभी गांव-गांव होते हुए 13 किलोमीटर पैदल चलकर अयोध्या की सीमा तक पहुंचे थे। वहां देखा कि गलियों में कंटीले तार पड़े हुए थे। पुलिस का भी सख्त पहरा था। बचने के लिए कारसेवक पास के पेड़ पर चढ़ गए थे। साढ़े तीन घंटे बाद जब पुलिस चली गई तो सभी नीचे उतरे। कई दिनों तक भूखे भी रहे। परिवार से भी संपर्क नहीं हो पा रहा था। बाद में पता चला कि पुलिस परिवारवालों को भी परेशान कर रही थी। बताया कि अयोध्या पहुंच कर भयानक दृश्य देखने को मिला।