20000 लागत, 2 महीने में तैयार, 4 माह तक चलती है कमाई! तारुन के किसान इस लाल फल से कमा रहे मुनाफा स्ट्रॉबेरी की खेती को नई ऊंचाई दी है। यह फसल कम समय में अधिक मुनाफा दे रही है तारुन। वर्तमान समय में खेती केवल परंपरागत फसलों तक सीमित नहीं रही है. बदलते दौर के साथ किसान भी खेती के नए तरीकों को अपना रहे हैं. अब किसान केवल अनाज या सब्जियों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि फलों की खेती की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं. खास बात यह है कि किसान अपने खेतों में एक ही समय में कई सीजनल फल और सब्जियां उगा रहे हैं, जिससे उन्हें कम समय में अच्छा मुनाफा मिल रहा है। ऐसी ही एक फसल है स्ट्रॉबेरी ।बालापुर गांव में स्थापित कृषि ऋषि सुभाष पालेकर मॉडल पंच स्तरीय बागवानी श्यामा देवी प्राकृतिक वाटिका में किसी उपवन से कम नहीं लगती। यहा सहफसली प्राकतिक खेती में अलग-अलग प्रकार के पेड़ पौधे अमरूद, नींबू, पपीता, बेर के साथ साथ मटर ,चुकंदर स्वीट पॉपकॉर्न , चना ,आलू ,लहसुन प्याज की प्राकृतिक खेती को व्यसाय का जरिया बना कर लोगो को बगैर केमिकल की उपज दे रहे है। किसान राम प्रसाद वर्मा ने बताया कि सितम्बर के अंतिम सप्ताह में घन जीवामृत को तैयार कर खेतो में डालकर नाली पर उद्यान विभाग से 30000 पौधे लाकर 20 विश्वा खेतो में स्ट्राबेरी की खेती शुरू की है। खेतो में पहले से अमरूद के पौधे लगे है। नाली के ऊपर चुकंदर व स्वीट पापकार्न की सहफसली खेती किया है। फरवरी प्रथम सप्ताह में स्ट्राबेरी में फल आने शुरू हो गए हैं जिससे उन्हें अच्छा मुनाफा देखने को मिला।बताया कि रोज तीन से 5 किलो फल निकल रहे हैं और लोकल बाजार में भी 250 से 300 इसका भाव मिल जा रहा है। कम लागत में तगड़ा मुनाफा किसान राम प्रसाद वर्मा बताते हैं कि वे पहले भी फल और सब्जियों की खेती कर रहे थे, क्योंकि इन फसलों में मुनाफा ज्यादा है. इस समय स्ट्रॉबेरी की फसल की लागत लगभग 20 हजार रुपये आती है मुनाफा काफी आ रहा है। स्ट्रॉबेरी की फसल सर्दियों के सीजन में होती है और इसकी मांग खूब रहती है, जिससे इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है. स्ट्रॉबेरी की रोपाई और देखभाल स्ट्रॉबेरी की खेती करना आसान है, लेकिन सही तरीके से करना जरूरी है. सबसे पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई की जाती है. इसके बाद खेत में गोबर और अन्य खाद का छिड़काव कर । मेड़ो पर फिर पौधों को थोड़ी-थोड़ी दूरी परब लगाया जाता है और तुरंत सिंचाई कर दी जाती है. पौधा लगाने के महज दो महीने बाद फसल निकलने लगती है. शुद्ध प्राकृति खेती कर किसानों के लिए मिसाल बने हैं रामप्रसाद वर्मा। जीवामृत बनाने के लिए शुद्ध देशी गाय के मूत्र ,गोबर,बेसन,गुड़ व मिट्टी को पानी मे मिलाकर तैयार गोल को छन कर पौधों व पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है। घनजीवामृत एक क्विंटल गोबर, एक किलोग्राम बेसन , 10 लीटर गो मूत्र, 500 ग्रा मिट्टी सभी को मिलाकर 72 घंटे में तैयार हो जाता है जिसको बुवाई के समय खेतों में छिड़काव किया जाता है। आठवें दिन सिचाई करनी पड़ती है। इसके लिए रोजगार के लिए दो लेबर प्रतिदिन रखे हुऎ हैं। पुरुस्कार अभी तक कई पुरास्कारों से नवाजे जा चूके हैं प्रगतिशील किसान राम प्रसाद वर्मा प्राकृतिक खेती के लिए कृषि मंत्री द्वारा प्राकृतिक खेती उल्लेखनीय कार्य के लिए पुरस्कार प्राप्त किए हैं ,इसके अतिरिक्त जिला अधिकारी द्वारा प्रशस्ति पत्र भी पा चुके हैं। रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय झांसी ने भी इन्हें प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सम्मानित किया है। डॉ पीके कनौजिया उपनिदेशक कृषि ने बताया कि इन्होंने सहफसली प्राकृतिक खेती गुणवत्ता पूर्ण तरीके से की है इनको जैविक प्राकृतिक खेती का प्रमाण पत्र शीघ्र ही मिल जाएगा तो इनके उपज का सही भाव मिलता रहेगा ।