अयोध्या स्थित राम मंदिर में साधु-संतों को प्रतिनिधित्व दिए जाने की मांग तेज हो गई हे। महंत विवेक आचारी कहते हैं कि अयोध्या के प्रमुख मंदिरों का संचालन सदियों से साधु-संतों और अखाड़ों की परंपरा के अनुरूप होता आया है। पी कारनेगी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जन्मस्थान (राम मंदिर) में 22 साधु रहते थे, जो पूरी व्यवस्था देखते थे। उनके अनुसार वर्तमान ट्रस्ट मॉडल में प्रशासनिक और संगठनात्मक ढांचा अधिक प्रभावी हो गया है, जबकि संतों की भूमिका सीमित कर दी गई है। ट्रस्ट वित्तीय प्रबंधन और लेखा व्यवस्था देख सकता है, लेकिन मंदिर की धार्मिक, आंतरिक और प्रशासनिक व्यवस्था संतों एवं अखाड़ों के हाथों में होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि सभी संबंधित अखाड़ों और परंपराओं को प्रतिनिधित्व देकर सामूहिक व्यवस्था विकसित की जाए। उन्होंने एक अपील भी किया कि राम मंदिर मामले पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। राम मंदिर को बदनाम करना बंद करें, क्योंकि बहुत हो चुका है। 528 साल बाद ये समय आया है कि मंदिर बन कर खड़ा हुआ है। समस्त देशवासियों से अपील है कि राम मंदिर मामले पर राजनीति बंद हो।