होली का पर्व हर वर्ग अपने-अपने अंदाज में मनाने में लगा है। मारवाड़ी समाज के लोग राजस्थान की परंपरा आज भी लोग संजोए हुए हैं। इसके होलिका की प्रतिमा संग बड़कुल्ला की माला को होलिका दहन के समय डाला जाता है। मारवाड़ी समाज की महिलाएं गाय के गोबर से बड़कुल्ला तैयार करने में लगी हैं। मारवाड़ी (अग्रवाल समाज) में इसको बड़े उत्साह से मनाया जाता है। सरिता भालोठिया ने बताया कि बड़कुल्ला तैयार करने की शुरूआत महाशिवरात्रि से होती है। एकादशी पर्व से होलिका की प्रतिमा व बड़कुल्ला तैयार कर सजाने का कार्य शुरू होता है। होलिका दहन के दिन राजस्थानी परिधान पहनकर महिलाएं पहले पूजन करती हैं। मान्यता है कि गाय के गोबर के उपले व कंडे से होलिका दहन की अग्नि से नकारात्मक ऊर्जा का विनाश होता है। गोबर में प्यूरीफाई तत्व पाए जाते हैं जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। जिले में करीब 400 से अधिक परिवार इसे बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। गाय के गोबर से ही होलिका की आकृति, ढाल, तलवार, होलिका के दहेज का सामान, विभिन्न देवताओं की प्रतिमा, खेलने का सामान, गृहस्थी के सामान आदि करीब 200 से तीन सौ पीस गाय के गोबर के छोटे छोटे बड़कुल्ला बनाकर हल्दी व कलर से उसे सजाया जाता है। होलिका दहन के बाद जले बड़कुल्ला को घर ले जाकर दरवाजे के सामने रखा जाता है, जिसे शुभ माना जाता है। सौरभ भालोठिया, राजेश कुमार अग्रवाल व विजय अग्रवाल बताते हैं कि शहर अमेठी में अग्रवाल समाज की ओर से रेलवे क्रॉसिंग के पास होलिका दहन किया जाता था लेकिन दो स्थानों पर समाज के लोग पूजन करहोलिका दहन में बड़कुल्ला डालते हैं। गाय के गोबर से किया जाता है तैयार शहर निवासी मीना अग्रवाल, एकता अग्रवाल, सुमन, अर्चिता, सोनजल, निहारिका, समृद्धि, आयुषी, नीलू बताती है कि राजस्थान से पूर्वज 150 वर्ष पूर्व आए थे। आज भी यह परंपरा चली आ रही है। परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से त्योहारों की परंपराओं के बारे में बेहतर ज्ञान मिलता है। बड़कुल्ला गाय गोबर के होलिका की आकृति आदि के साथ छोटे-छोटे गोलाकार, चांद, सूरज और हाथों के आकार में बनाकर उसमें बीच से छेद करके धूप में सुखाया जाता है। महिलाएं माला को बच्चों पर फेरकर होलिका की अग्नि में जला देती हैं। मान्यता है कि इन्हें जलाने से घर से जुड़ी परेशानियां और बच्चों पर लगी बुरी नजर हट जाती है। होली के एक दिन पहले पूजा अर्चना के बाद होलिका दहन में बड़कुल्ला डाला जाएगा। इस बार भद्रा होने से सोमवार शाम पांच बजे को महिलाएं पूजन-अर्चन करेंगी।