कलछी चलानी तो कभी सीख जाओगी, अभी कलम का वक्त है...ये वो माता-पिता के शब्द हैं जो बेटियों को भेदभाव की दहलीज से निकालकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। इसी प्रकार की कई सीख रविवार को अमर उजाला कार्यालय में संवाद के दौरान महिला चिकित्सकों ने दीं। कहा, अच्छी शिक्षा और संस्कार से बढ़कर कोई पूंजी नहीं होती है। ये दोनों चीजें बच्चों को देना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमारे देश की संस्कृति पूरे विश्व में नजीर है। इसलिए सोच भले ही नई हो पर परंपरा-संस्कार परिवार के ही अपनाने चाहिए। महिलाओं को परिवार को लेकर चलना चाहिए। बेटे-बेटियों को शिक्षा और कॅरिअर के लिए बराबर अवसर देना चाहिए।