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Udaipur News: महाराणा सांगा पर विवादित बयान से मेवाड़ में आक्रोश, राणा के वंशजों ने दी कड़ी प्रतिक्रिया

Tue, 25 Mar 2025 11:41 AM IST
उदयपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उदयपुर

सपा सांसद रामजीलाल द्वारा महाराणा सांगा के लिए विवादित टिप्पणी के बाद पूरे मेवाड़ में आक्रोश है। उनके इस बयान के बाद उदयपुर में एक तरफ जहां राजपूत संगठनों के साथ अन्य सामाजिक संगठनों ने खुलकर विरोध करते हुए उनके खिलाफ हिरण मगरी थाने में मामला दर्ज करवाया है, वहीं दूसरी ओर उनके वंशजों का भी बयान सामने आया है। 

महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) के वंशज हनुमंत सिंह बोहेड़ा ने अपना बयान जारी करते हुए सपा सांसद की अनर्गल टिप्पणी पर आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि पूरे हिंदुस्तान को एक झंडे के नीचे लाने का काम किसी ने किया है तो वो सिर्फ महाराणा संग्राम सिंह हैं। जिस प्रकार महाराणा प्रताप को प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रूप मे जाना जाता है, उसी प्रकार उस कालखंड मे पूरे हिंदुस्तान को एक जाजम पर या एक झंडे के नीचे लाने के काम के लिए महाराणा संग्राम सिंह को जाना जाता है। शरीर पर 80 घाव लगने के बाद भी कोई युद्ध के मैदान में दुश्मनों के सिर धड़ से अलग कर रहा था, तो वो सिर्फ महाराणा संग्राम सिंह थे।

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बोहेड़ा ने बताया कि जिस सपा नेता ने राज्यसभा में महाराणा सांगा पर बाबर को न्योता देकर यहां लाने का इल्जाम लगाया है, उन्हें ये मालूम नहीं कि महाराणा सांगा ने ही हिंदुस्तान को बाहरी आक्रांताओं से आजाद करने के लिए अफगानिस्तान से हिंदुस्तान की ओर आ रहे दर्रे पर 10 हजार सैनिक पदस्थ करने की व्यवस्था बताई थी, जिससे कोई हिंदुस्तान में प्रवेश ना कर पाए। राणा सांगा ही एकमात्र ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान की आजादी के लिए अफगानिस्तान तक युद्ध लड़े थे।

उदयपुर के आहड़ संग्रहालय में स्थित एक ऐतिहासिक शिलालेख विक्रम संवत् 1583 (1526 ई.) का है। इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार जब मुगल शासक बाबर ने महाराणा सांगा को युद्ध के लिए ललकारा, तब आहड़ के अधिकारी सहसा (सहेसा) ने महाजनों और स्थानीय नागरिकों को सचेत करने के लिए यह शिलालेख स्थापित कराया।

यह शिलालेख श्रावण कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि का है और इसमें संस्कृत तथा स्थानीय भाषा का प्रयोग किया गया है। इसमें आहड़ को आघाट पुरी और तांबावल्ली (तांबावती नगरी) नाम से उल्लेखित किया गया है। यह अभिलेख उस समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का प्रमाण है।

इतिहासकारों के अनुसार किसी भी भारतीय शिलालेख में महाराणा सांगा को पराजित नहीं बताया गया। गुजरात के शत्रुंजय तीर्थ में लगे शिलालेख में भी उन्हें अंतिम सांस तक हर युद्ध में विजयी रहने वाला शासक बताया गया है। राणा सांगा ने कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े और लोदी जैसे शासकों को पराजित किया। उनका नाम भारतीय इतिहास में वीरता और अपराजेयता के प्रतीक के रूप में अंकित है।

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