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भेड़ों की ऊन का व्यापार हुआ खत्म, सिंथेटिक को ज्यादा पसंद करने लगे लोग

अंकेश ठाकुर Updated Sun, 09 Nov 2025 02:12 PM IST

ठंड का मौसम शुरू होते ही जिला चंबा, कांगड़ा और जेएंडके से भेड़पालकों ने पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी इलाकों का रुख करना शुरू कर दिया है। ऐसे में चरवाहे पठानकोट और पंजाब के अन्य जिलों में अपनी भेड़ों के साथ पहुंचने लगे हैं। इसी के साथ भेड़ों की ऊन उतारने का काम भी शुरू हो चुका है लेकिन भेड़पालकों को अब चिंता सताने लगी है कि उनकी भेड़ों की ऊन को कोई खरीद नहीं रहा है क्योंकि भेड़पालकों के मुताबिक ऊन की ब्रिकी पिछले करीब 4 वर्षों से बंद हो चुकी है। ऊन की ब्रिकी नहीं होने से भेड़पालकों में सरकार प्रति नाराजगी है क्योंकि भेड़पालकों ने ऊन से कमरे भर रखे हुए और ब्रिकी ना होने पर उन्हें ऊन को दरिया में बहाना पड़ रहा है। मार्केट में आजकल सिंथेटिक और रेशम कीट के धागे से बने गर्म कपड़ों को लोग ज्यादा पसंद करने लगे हैं जबकि भेड़ की ऊन से बने कपड़ों से कई फायदे होते हैं, जैसे वे गर्म और आरामदायक होते हैं, नमी को नियंत्रित करते हैं और त्वचा के लिए नरम होते हैं। ऊनी कपड़े टिकाऊ होते हैं, जल्दी खराब नहीं होते और उनमें गंध भी कम आती है। इसके अतिरिक्त वे प्राकृतिक, नवीकरणीय और पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। सिंथेटिक सामग्रियों के विपरीत, भेड़ की ऊन में अद्वितीय श्वसन क्षमता होती है जो इसे ज्यादा गर्म होने से बचाती है, जिससे यह घर के अंदर इस्तेमाल के लिए आदर्श बनती है। एक्सपर्ट की माने तो सिंथेटिक कपड़ों के कई नुकसान हैं, जिनमें त्वचा में जलन और एलर्जी, सांस न ले पाने के कारण चिपचिपापन और बदबू, आग का खतरा और पर्यावरण को नुकसान शामिल हैं। इसके अलावा, इनमें मौजूद रसायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पैदा कर सकते हैं। क्या कहते हैं भेड़पालक पठानकोट भेड़ों के साथ पहुंचे हिमाचल प्रदेश के गांव चूल्हा, तहसील चौराहा जिला चंबा निवासी महिंदर सिंह ने बताया कि उनका पुशतैनी काम भेड़ पालना और ऊन बेचना है। जैसे ही हिमाचल की पहाड़ी में ठंड ज्यादा बढ़ती है तो वे मैदानी क्षेत्रों में भेड़ों के साथ आ जाते है। आज से 5 पहले सरकार यां निजी व्यापारी को 50 से 60 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से ऊन की ब्रिकी करते थे। अगर कोई भेड़ बीमार होती है तो सरकार की तरफ से कोई ठोस सहायता भी नहीं मिलती है। एक भेड़ का पालन पोषण करना बहुत मुश्किल भरा होता है। हिमाचल और जेएंडके में ज्यादा भेड़पालक हैं और अब सभी भेड़पालकों से कोई ऊन खरीद नहीं रहा। वहीं, अगर कोई बाघ या शेर भेड़ का शिकार कर जाए तो तब ओर ज्यादा नुकसान हो जाता है। सरकार भी उनके इस रोजगार को खत्म होता देख कोई ठोस कदम नहीं उठा रही। उनकी मांग है कि सरकार या तो भेड़पालकों के लिए कोई प्लांट लगाए जहां भेड़ों की ऊन को बेच सही दाम मिल सके।

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