शाजापुर जिले के अवंतिपुर बड़ोदिया क्षेत्र में होली के पाचंवें दिन विज्ञान को चुनौती देने वाला नजारा हर वर्ष सामने आता है। दरअसल यहां बाबा गरीब नाथ की समाधि स्थल पर ध्वज चढ़ाया जाता है। ध्वज लगाने के लिए गहरा गड्डा खोदा जाता है। इस गड्डे में श्रद्धाल नारियल, पान और नमक रखते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से मनोकामना पूरी होती है। खास बात यह है कि अगले वर्ष जब नया ध्वज चढ़ाने के लिए यह गड्डा खोदा जाता है तो नारियल, पान और नमक उसी स्थिति में मिलते हैं। जैसे रखे गए थे। श्रद्धालु इसे धर्म स्थल का प्रभाव और महिमा मानते हैं।
आयोजित कार्यक्रम में हजारों भक्तगण श्रद्धा, आस्था भक्ति के सागर में गोते लगाते हुए दिखाई दिए। बाबा गरीब नाथ की समाधि स्थल पर सागौन की लकड़ी से बने 85 फीट ऊंचे स्मृति ध्वज को चढ़ाया गया। यह परंपरा 725 वर्षों से चली आ रही है। आयोजन में भक्तों द्वारा बाबा के दरबार में शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया। सुबह से ही यहां श्रद्धालुओं का जुटना शुरू हो गया था। श्रद्धालुओं का मानना है कि जब ध्वज चढ़ाया जाता है, तब भक्तों को दर्शन देने के लिए बाबा भंवरे के रूप में ध्वज के ऊपर मंडराते हैं। ऐसे में श्रद्धालु भी बाबा की एक झलक पाने के लिए ध्वज के ऊपर ही निगाह जमाए रहे। ताकि बाबा के दर्शन करके उनके द्वारा मांगी गई मन्नत पूरी हो। आयोजन में आसपास के क्षेत्र से 50 हजार से अधिक भक्तों ने बाबा के दर्शन किए। कालापीपल विधायक घनश्याम चंद्रवंशी के साथ-साथ कई जन प्रतिनिधियों ने दरबार में पहुंचकर दर्शन किए।
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समाधि के बाद गंगा किनारे दिए थे दर्शन
बाबा गरीबनाथ का जन्म कब और कहां हुआ यह तो अज्ञात है। किंतु बताया जाता है कि बाबा संवत 1248 में झांसी के जूना मठ से तीर्थ यात्रा को निकले और अवंतीपुर बड़ोदिया में नेवज नदी किनारे सुरम्य स्थान देख कुटिया बनाकर मां लालबाई फूलबाई की सेवा करते हुए यहीं रहने लगे। बाबा ने संवत 1344 में चैत्र माह की पंचमी को एक उत्सव के रूप में समाधि ली। कुछ माह पश्चात सावन मास संवत 1345 में गांव के बुजुर्ग लोग जब तीर्थ यात्रा के लिए उत्तर प्रदेश के सोरोंजी में गंगा स्नान कर रहे थे। तब एकाएक बाबा ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। ग्रामीणों ने देखा तो बाबा गरीबनाथ से पुनः अवंतिपुर बड़ोदिया चलने को कहा गया तो उन्होंने मना किया। तब तीर्थयात्रियों ने उन्हें हठपूर्वक डोली में बैठा दिया। किंतु लश्कर के आसपास अन्तर्ध्यान हो गए और एक पत्र छोड़ गए। इसमें समाधि उत्सव का सम्पूर्ण विधान लिखा था। तभी से प्रतिवर्ष रंगपंचमी के अवसर पर ध्वज चढ़ाने के साथ मेले का आयोजन यहां होता है।