ये पितृपक्ष है
भाद्रपद की धूप है ठहरी भाऊ।
सितम्बर, जमना तीर खिंची पाऊं,
फिर दिल्ली की
सफेद फूली घास।
मन के ज़मीन दबता गया
जो जो इतिहास,
साल दर साल,
साल दर साल
फूटता आया ज़मीन के मन से, वो वो।
आ भाऊ तुझे जमना में
समय की एकहरी सिलवट दिखाऊं।
स्मृति के दोहराए देह में
ये किनारे भाऊ,
जहाँ आवृत्ति का ऊगा कांश
मिटटी का लोम हर्ष है।
ये पितृपक्ष है।
कौतिक को अभी सोलह रातें और ठहरना होगा,
सोलह दिन और।
जब मैं तुम सा उत्सुक उतावला था,
मैंने इसी कांश में भविष्य का रोमांच रचा था,
गीत रचे थे, भेष रचा था, साल दर साल
सालों का प्रीत रचा था।
अब पूर्वजों के नाम रच रहा हूँ,
पौत्र रच रहा हूँ, अक्षर अक्षर।
एक दिन मुझे भी इसी ठौर रहना होगा,
और तुम्हें
किसी और से कहना होगा
कि भाद्रपद की धूप है ठहरी भाऊ,
कि कौतिक को अभी सोलह रातें और ठहरना होगा,
सोलह दिन और।
कि जो मृत है, मर ही नहीं पाता,
और जो जीवित है, जी नहीं पाता,
कि भाऊ
वो कांश कभी किसी बरस थी,
और ये कांश
तेरे समक्ष है।
(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)