पश्चिम बंगाल की चर्चित फलता विधानसभा सीट पर हुए ऐतिहासिक पुनर्मतदान में भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने रिकॉर्ड जीत दर्ज कर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है। 22वें और अंतिम राउंड की मतगणना के बाद देबांग्शु पांडा को विजयी घोषित कर दिया गया। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सीपीआईएम उम्मीदवार शंभू नाथ कुर्मी को 1.09 लाख से अधिक वोटों के विशाल अंतर से हराया।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार देबांग्शु पांडा को कुल 1,49,666 वोट मिले। दूसरे स्थान पर रहे सीपीआईएम प्रत्याशी शंभू नाथ कुर्मी को 40,645 वोट मिले। कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक मोल्ला तीसरे नंबर पर रहे, जबकि सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress के उम्मीदवार जहांगीर खान चौथे स्थान पर पहुंच गए और उन्हें केवल 7783 वोट ही मिले। यह नतीजा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि फलता सीट लंबे समय से राजनीतिक तनाव और चुनावी विवादों का केंद्र रही है।
लेकिन अब सबसे ज्यादा चर्चा देबांग्शु पांडा की हो रही है, जो इस रीपोल चुनाव के दौरान भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। दक्षिण 24 परगना जिले की संवेदनशील फलता सीट पर उन्होंने पूरे चुनाव अभियान के दौरान आक्रामक तरीके से प्रचार किया। पांडा लगातार आरोप लगाते रहे कि इलाके में वर्षों से चुनावी धमकी और धांधली का माहौल रहा है। उन्होंने दावा किया था कि फलता की जनता इस बार “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव” चाहती है। रीपोल के दौरान भाजपा के आंदोलन और चुनावी रणनीति का प्रमुख चेहरा भी वही बने।
देबांग्शु पांडा पेशे से वकील हैं। चुनावी हलफनामे के मुताबिक उन्होंने अपनी कुल संपत्ति लगभग 1.92 करोड़ रुपये घोषित की है। इनमें 1.32 करोड़ रुपये से अधिक की चल संपत्ति और करीब 60 लाख रुपये की अचल संपत्ति शामिल है। उनकी संपत्तियों में बैंक जमा, आभूषण, कृषि भूमि और आवासीय संपत्ति शामिल हैं। इसके अलावा उनके पास महिंद्रा स्कॉर्पियो N और रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल भी है।
हलफनामे में यह भी बताया गया है कि उनकी कुल देनदारियां लगभग 12 लाख रुपये हैं। देबांग्शु पांडा ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए करीब 6.9 लाख रुपये वार्षिक आय घोषित की है। उनकी पत्नी सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांडा ने खुद को सिर्फ भाजपा उम्मीदवार के रूप में नहीं बल्कि “निष्पक्ष चुनाव” की मांग उठाने वाले नेता के तौर पर स्थापित किया, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला।
फलता सीट इस बार सिर्फ चुनावी मुकाबले की वजह से नहीं बल्कि ईवीएम विवाद के कारण भी राष्ट्रीय सुर्खियों में रही। 29 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के दौरान कई बूथों पर ईवीएम में छेड़छाड़ और गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे। शिकायतों में कहा गया था कि मशीनों पर इत्र जैसी चीजें और चिपचिपे टेप लगाए गए थे। वेब कैमरों के फुटेज के साथ छेड़छाड़ के आरोप भी सामने आए थे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए Election Commission of India ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए फलता विधानसभा क्षेत्र के सभी 285 बूथों पर मतदान रद्द कर दिया था। इसके बाद 21 मई को पूरी सीट पर दोबारा मतदान कराया गया। पुनर्मतदान के दौरान केंद्रीय बलों की 35 कंपनियां तैनात की गईं और 87 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज हुआ।
अब देबांग्शु पांडा की यह जीत सिर्फ एक विधानसभा सीट की जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश माना जा रहा है।