मंडी-कोटली मार्ग पर स्थित त्रोकड़ाधाम केवल पूजा-अर्चना स्थल नहीं, बल्कि भक्ति, साहस और तपस्या की अमर पाठशाला है। यह धाम आज श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है। मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को जाग होती है, जिसमें माता के गूर देववाणी करते हैं। श्रद्धालुओं की ओर से भजन-कीर्तन व भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। मान्यता है कि मां अंबिका माता नाऊ-पनाऊ की कृपा से दुर्गा रूप में एक पत्थर से प्रकट हुईं और उनके एक अनोखे भक्त और देवी मां के अद्भुत आशीर्वाद से इस धाम की स्थापना हुई। सैकड़ों वर्ष पहले एक साधक ने इस स्थान पर गहन तपस्या की थी। मां ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया कि यह भूमि भविष्य में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनेगी। भक्तों का मानना है कि मां की पूजा-अर्चना करने से संकट दूर होते हैं। गांव साई निवासी लाभ सिंह के अनुसार त्रोकड़नाला में डंगे के निर्माण कार्य के दौरान एक भारी पत्थर किसी से हिलाया नहीं जा रहा था। जब ठेकेदार ने उसे तोड़ने के निर्देश दिए तो यह दो भागों में टूटा और बीच से माता की भव्य मूर्ति निकली। यह मूर्ति आज भी मंदिर में स्थापित है। लाभ सिंह के अनुसार महामायी त्रोकड़ा की कृपा से अब वहीं पर ही पितरों का उद्धार, संतान प्राप्ति, भूत-प्रेत साया को दूर करना, नवग्रहों की शांति संबंधी अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां नशीले पदार्थ पूरी तरह से त्याज्य हैं। यहां प्राणी, पशु, पक्षी की बलि प्रथा से हटकर केवल एक ही नारियल से सभी कार्यों को सफल किया जाता है।