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रेवाड़ी में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन जमकर झूमे श्रद्धालु

विश्व सनातन धर्म सेवा ट्रस्ट की ओर से अग्रवाल भवन में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन जमकर श्रद्धालु झूमे। इस दौरान बारा हजारी जगन्नाथ मंदिर के पंडित टेकचंद और पंडित महेश चंद ने पंडित काशीनाथ मिश्र का पगड़ी पहनाकर स्वागत किया। पंडित काशीनाथ मिश्र ने कहा कि इस अवसर पर त्रिकाल संध्या क्या है। इसे कैसे किया जाता है। उन्होंने कहा कि त्रिकाल संध्या का अर्थ है दिन में तीन बार प्रात, दोपहर और सायं ईश्वर का ध्यान और प्रार्थना करना। यह साधना अत्यंत पवित्र और रक्षक मानी जाती है, विशेषकर कलियुग के अंतिम समय में। इसका उल्लेख कई शास्त्रों और संतों की वाणियों में मिलता है। यह परंपरा पूर्व युगों से चली आ रही है। किंतु कलियुग के प्रभाव के कारण यह धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। केवल वे ही लोग भगवान कल्कि का साक्षात्कार करेंगे जो त्रिसंध्या का पालन करेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि यह साधना ईश्वर प्राप्ति का सरल किंतु अत्यंत शक्तिशाली मार्ग है। अनेक भक्तों ने इसके माध्यम से प्रभु की उपस्थिति का अनुभव किया है। भविष्य मालिका में भी इसका उल्लेख मिलता है जो व्यक्ति दिन में सुबह, दोपहर और शाम त्रिसंध्या का जप और स्मरण करता है, वह अपने सात पीढ़ियों को मुक्त कराता है। ऐसे व्यक्ति का हृदय इतना पवित्र हो जाता है कि पाप उसमें प्रवेश नहीं कर सकता। पाप उनसे ऐसे भागते हैं जैसे गरूड़ को देखकर सर्प भाग जाते हैं। जो व्यक्ति त्रिकाल संध्या का पालन नहीं करता, उसके द्वारा किए गए तर्पण (भोजन और दान) उसके पूर्वज या देवता स्वीकार नहीं करते। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक नवीन भुराड़िया व रितु भुराड़िया ने कहा कि 29 दिसंबर को महायज्ञ के साथ कार्यक्रम का समापन होगा। इसके बाद प्रसाद वितरण किया जाएगा।

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