संवाद न्यूज एजेंसी 75 केंद्र किराये के भवनों में, 10 पुराने स्कूलों में संचालित; बारिश में टपकती छतें और दीवारों में दरारें बनी चिंता नारनौल। आंगनबाड़ी केंद्रों में नौनिहालों को खेल-खेल में शिक्षा और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने की सरकारी योजना जिले में बदहाल व्यवस्थाओं की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। नारनौल शहर के कई आंगनबाड़ी केंद्र ऐसे जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं, जहां हर समय हादसे का खतरा बना रहता है। 10 केंद्र पुराने स्कूल भवनों में चल रहे हैं, जिन्हें भवन जर्जर होने के कारण स्कूल संचालन के लिए अनुपयुक्त मानकर खाली कर दिया गया था। वहीं 75 किराये के भवनों में चल रहे हैं। बारिश और तेज हवा के दौरान इन भवनों की छतों से पानी टपकता है, दीवारों में सीलन और दरारें दिखाई देती हैं। ऐसे हालात में नौनिहालों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को हर दिन डर के साये में समय बिताना पड़ रहा है। शहर के वार्ड नंबर-18 स्थित सलामपुरा में आंगनबाड़ी केंद्र पुराने स्कूल भवन में संचालित है। भवन के अधिकांश कमरों की छत और दीवारें गिर चुकी हैं। एक कमरे में केंद्र चल रहा है, जहां छत की लकड़ियों में दीमक लग चुकी है और बारिश के समय लगातार पानी टपकता है। केंद्र में बिजली का बल्ब तो लगा है, लेकिन फिटिंग खराब होने के कारण वह जलता नहीं है। वार्ड नंबर-5 के नलापुर में दो आंगनबाड़ी केंद्र हैं। एक पुराने स्कूल भवन में और दूसरा किराये के मकान में संचालित हो रहा है। स्कूल भवन की दीवारों का प्लास्टर झड़ चुका है, जिसे सरकारी योजनाओं के पोस्टरों से ढक दिया गया है। खिड़की में न जाली है और न ही शीशे। बारिश और आंधी में पानी व मिट्टी सीधे कमरे के अंदर पहुंच जाती है। वहीं किराये के भवन की दीवारों में दरारें हैं और सड़क का स्तर ऊंचा होने से हल्की बारिश में भी कमरे में पानी भर जाता है। वार्ड नंबर-4 के बांस मोहल्ले का आंगनबाड़ी केंद्र भी पुराने स्कूल भवन में चल रहा है। भवन बाहर से ही खंडहर जैसा दिखाई देता है। छत टपकती है, दीवारों में सीलन रहती है और बरसात में परिसर में पानी जमा हो जाता है। जिले में 1201 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित: जिले में कुल 1201 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। इनमें नारनौल शहरी क्षेत्र के 87 केंद्रों में से 75 किराये के भवनों, 10 पुराने स्कूल भवनों और केवल दो केंद्र महिला एवं बाल विकास विभाग के अपने भवनों में चल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहर के केंद्रों की स्थिति अधिक खराब बताई जा रही है। आरओ सिस्टम बने शोपीस: केंद्रों में पेयजल व्यवस्था भी अधूरी है। बच्चों के लिए लगाए गए आरओ सिस्टम केवल शोपीस बने हुए हैं, क्योंकि अधिकांश केंद्रों में पानी का कनेक्शन ही नहीं है। ऐसे में बच्चों को मटकों और कैंपरों के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके अलावा अधिकांश केंद्रों में रसोई की अलग व्यवस्था नहीं है। जिस कमरे में बच्चे पढ़ते और खेलते हैं, वहीं गैस सिलिंडर रखकर भोजन तैयार किया जाता है। इससे किसी भी समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।