कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय (कुवि) परिसर में वीरवार को प्रशासन द्वारा लड़कियाें को लड़कों के साथ होली खेलने से रोकने के बाद विवाद बढ़ गया। प्रशासन ने छात्राओं को रोकने के लिए उन्हें पांच बजे बाद छात्रावास से बाहर नहीं निकलने दिया व नहीं किसी छात्रा को अंदर जाने दिया। इस सख्ती के खिलाफ छात्राओं ने धरना शुरू कर दिया। विरोध दो स्तरों पर चल रहा है आधी छात्राएं छात्रावास के बाहर बैठी हैं, तो आधी अंदर प्रदर्शन कर रही हैं। होली खेलने से रोकने पर शुरू हुआ विवाद ने कुछ समय में ही छात्र-छात्राओं में भेदभाव का तूल पकड़ लिया और महिला छात्रावास की समय सीमा पुरुष छात्रावास के बराबर करने की मांग पर आकर अड़ गया। छात्राओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि लड़कों के छात्रावास में पूरी रात किसी भी तरह की आने-जाने की कोई रोक-टोक नहीं है, लेकिन हम लड़कियों को शाम 6:30 बजे के बाद बाहर नहीं निकलने दिया जाता। होली के पर्व पर भी पुरुष दोस्तों के साथ होली खेलने से रोकना स्पष्ट रूप से लैंगिक असमानता है। जब तक बराबरी का समय नहीं मिलेगा तब तक विरोध जारी रहेगा। प्रदर्शनकारी छात्रा व छात्र नेत्री गीताजंली ने बताया कि होली के दिन विश्वविद्यालय परिसर में रंगों से होली खेली जा रही थी। इस दौरान परिसर में आउट साइडर आ गए तो प्रशासन ने उन्हें बाहर निकालने की जगह छात्राओं को ही 6:30 बजे ही छात्रावास में बंद कर दिया। इस दौरान बहुत सी छात्राएं बाहर होली खेल रही थी, जिन्हें बाद में अंदर नहीं जाने दिया। गीताजंली ने कहा कि प्रशासन आउट साइडरों को रोकने में बुरी तरह विफल है और छात्राओं को सुरक्षा नहीं दे पा रहा है। इसलिए अब प्रशासन ने छात्राओं को छात्रावास में बंद कर दिया। इस दौरान छात्रावास में होली मिलन कार्यक्रम के लिए डीजे बैरिकेड पर पहुंचा तो छात्राओं ने उसे भी वहीं रोक लिया और बोली हर विश्वविद्यालय में डीजे नाइट बाहर होती है, अब अगर डीजे बजेगा तो बाहर ही बजेगा नहीं तो बजेगा ही नहीं। समाचार लिखे जाने तक उनका प्रदर्शन जारी रहा। 21 वीं सदी में अगर विश्वविद्यालय में भी लैंगिक असमानता प्रदर्शनकारी छात्राएं पूजा, सिमरन, ज्योति ने कहा कि अगर 21 वीं सदी में एक विश्वविद्यालय में भी लैंगिक असमानता का सामना करना पड़ रहा तो यह कैसा विश्वविद्यालय है। हम छात्राएं अपनी सुरक्षा के लिए अपनी फीस में सुरक्षा के लिए अलग से चार्ज देती है। फिर भी हमें शरारती तत्वों से बचाने के नाम पर छात्रावास में कैद कर दिया जाता है। जैसे किसी स्कूली बच्चों को बंद किया जाता है। हम विश्वविद्यालय में समाज में अपनी बराबरी दर्ज करवाने के लिए आई थी, लेकिन हमें तो यहीं भी असमानता का सामना करना पड़ रहा है।