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मेरा गांव मेरी शान: तोशाम की 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना मुंगीपा धाम गहरी आस्था और दर्शनीय केंद्र

तोशाम की करीब आठ सौ फीट ऊंची पहाड़ी धार्मिक एवं इतिहास को समेटे हुए है। पहाड़ी पर बना बाबा मुंगीपा धाम तोशाम ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्र के लोगों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है, वहीं बेहद दर्शनीय स्थल है। बाबा मुंगीपा के साल में दो बार मेले लगते हैं। हर साल कार्तिक पूर्णिमा का विशाल मेले का आयोजन होता है। अनेक स्थानीय भक्तों द्वारा पहाड़ी के चारों ओर परिक्रमा की जाती है। प्रत्येक मंगलवार को परिक्रमा में श्रद्धालुओं की संख्या काफी रहती है, जिसमें आसपास के गांवों से महिलाएं एवं पुरुष भाग लेते हैं साथ ही भंडारे का आयोजन भी होता है। प्रति माह चौदस को श्रद्धालुओं की भीड़ देखते ही बनती है। बाबा ने पहाड़ी पर की थी तपस्या मान्यता है कि बाबा मुंगीपा के बचपन का नाम चंद्रावल था। चंद्रावल गोपीचंद की बहन और राजा भृतहरि की भांजी थी। चंद्रावल ने तोशाम पहाड़ी पर आकर कई वर्ष तक तपस्या की। चंद्रावल मूंगे रंग के वस्त्र धारण करती थी, इसलिए इस क्षेत्र के निवासी उन्हें मुंगी मां कहते थे। मुंगी मां के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद उनका नाम समय बीतने के साथ-साथ मुंगीपा हो गया और उनका मंदिर यहां पर बना दिया गया। तपस्वी बाबा मुंगीपा ने पहाड़ पर तपस्या कर यहीं पर समाधि ली, जिसकी याद में हर साल कार्तिक पूर्णिमा को भव्य मेले का आयोजन होता है। किवदन्ती है कि तपस्या के दौरान जब गाय ने उनकी समाधि भंग कर दी तो उन्होंने हाथ के इशारे से गाय को दूर हटने का संकेत किया। इस पर गाय दौड़ पड़ी और पहाड़ से नीचे गिरकर मौत हो गई। बाबा ने गाय की मौत का स्वयं को दोषी माना और उसी समय अपनी देह त्याग दी। वे रिद्धि-सिद्धी व मुक्ति को प्राप्त थीं। सच्चे मन से यहां पर आने वालों की बाबा हर मनोकामना पूरी करते हैं। बड़े-बड़े राजनेता एवं उद्योगपति बाबा के सामने अपना शीश नवाजते हैं। यहां आते समय कस्बे से तीन-चार मील दूर से पहाड़ अनायास ही आने वालों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। समीप आने के साथ ही पहाड़ पर बने बाबा मुंगीपा मंदिर की दिव्यता बनती जाती है।

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