काली काली जुल्फों के फंदे ने डालो, हमें जिंदा रहने दो ए हुस्न वालों...। जब मंच पर आए नियाजी निजामी ब्रदर्स ने यह गाना पेश किया तो सभागार में बैठे श्रोताओं की सांसें थम सी गईं। प्रेम और दर्द का यह सूफियाना मेल हर दिल को छू गया। वहीं जब महफिल में गूंजा, तालाबों में मेहंदी की महक बाकी है, तो माहौल में एक अजीब सी ताजगी, नमी और मोहब्बत का अहसास भर गया। ऐसा लगा जैसे हवाओं में फूलों की खुशबू घुल गई हो और दिलों में अधूरी मोहब्बत की कहानियां जीवंत हो उठी हों। इस आवाज का साथ हवाओं में लहराती तालियां दे रही थीं। कमानी ऑडिटोरियम की रौशन शाम जब सूफियाना रंगों से सराबोर हुई, तो मानो संगीत ने समय को थाम लिया। विजेज एंड ब्लेसिंग्स एनजीओ के वार्षिक आयोजन जश्न-ए-कव्वाली का चौथा अध्याय शुक्रवार को एक ऐसी रूहानी याद बन गया, जिसे श्रोता लंबे समय तक अपने दिल में संजोए रखेंगे।