बिहार की राजनीति में इन दिनों युद्ध से पहले की शांति जैसा माहौल नजर आ रहा है। भले ही सतह पर सब कुछ शांत दिखे, लेकिन भीतर ही भीतर सियासी बिसात पर मोहरे सजाए जा रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर चल रहा है। एक तरफ जहां विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद महागठबंधन के पास करने को बहुत कुछ नहीं बचा है, वहीं दूसरी ओर एनडीए के अंदर वर्चस्व की लड़ाई अब विधान परिषद और राज्यसभा की सीटों को लेकर सामने आने लगी है। फिलहाल सबसे पहले ध्यान विधान परिषद के उपचुनाव पर है, क्योंकि यह नीतीश कुमार सरकार के एक मंत्री के राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है और इससे आगामी मंत्रिपरिषद विस्तार की दिशा भी तय होगी। राज्यसभा के लिए भी समानांतर रूप से रणनीति तैयार की जा रही है। बीते चुनाव के बाद एनडीए के भीतर चार विधान परिषद सीटें खाली हुई हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तारापुर से और मंत्री मंगल पांडेय सीवान से विधायक बन गए हैं। वहीं, विधान पार्षद रहे भगवान सिंह कुशवाहा जगदीशपुर से और राधाचरण शाह उर्फ राधाचरण सेठ संदेश से विधायक चुने गए हैं। हालांकि, इनमें से केवल दो सीटों पर ही उपचुनाव होगा, जबकि शेष दो सीटों पर जून में नियमित चुनाव कराए जाएंगे। सम्राट चौधरी की विधान परिषद सदस्यता का कार्यकाल 28 जून तक ही बचा है और भगवान सिंह कुशवाहा का कार्यकाल 15 नवंबर तक था। इतने कम समय के लिए उपचुनाव कराना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा, इसलिए इन दोनों सीटों पर जून में खाली होने वाली छह सीटों के साथ ही चुनाव होगा। उस समय कुल आठ सीटों के लिए मतदान होगा। चूंकि विधानसभा में एनडीए के पास 202 विधायक हैं, इसलिए यह चुनाव औपचारिकता भर माना जा रहा है। अब असली सियासी गणित दो उपचुनाव वाली सीटों पर है। मंगल पांडेय के विधायक बनने से खाली हुई सीट का कार्यकाल मई 2030 तक है, जबकि राधाचरण साह की सीट अप्रैल 2028 तक वैध है। यानी, इन सीटों पर चुने जाने वाले उम्मीदवारों को अपेक्षाकृत कम अवधि का कार्यकाल मिलेगा। ऐसे हालात में पहले भी कई नेता आगे का अवसर न मिलने के कारण राजनीतिक रूप से फंस चुके हैं। कम अवधि वाली सीट फिलहाल जदयू के खाते में मानी जा रही है। यदि यह सीट जदयू के पास ही रहती है, तो अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार की इच्छा पर निर्भर करेगा। वहीं, 2030 तक वाली सीट भाजपा के कोटे की है। एनडीए के भीतर पहले से तय रणनीति के तहत जदयू को छोड़ अन्य सहयोगी दलों के समन्वय की जिम्मेदारी भाजपा के पास ही है। इस एकमात्र भाजपा कोटे की उपचुनाव सीट को राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को देना लगभग तय माना जा रहा है। दीपक प्रकाश नवंबर में मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, लेकिन वे विधायक या विधान परिषद सदस्य नहीं हैं। ऐसे में यदि जून तक उनका विधान परिषद में प्रवेश नहीं होता, तो संवैधानिक बाध्यता के कारण उन्हें मंत्रिपरिषद से बाहर होना पड़ेगा। यही वजह है कि इस सीट पर समझौता भाजपा के लिए राजनीतिक मजबूरी बन चुका है।