अयोध्या में श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को होनी है। अयोध्या से लेकर देश के कोने में इसे उत्सव के रूप में मनाने की तैयारी जोरों पर चल रही है। रामभक्तों की टोलियां घर-घर अक्षत बांट रही हैं। सभी से 22 जनवरी के दिन दीपक जलाकर दिवाली मनाने की अपील की जा रही है।
बबराला के कारसेवक अरुणकांत वार्ष्णेय ने बताया कि श्रीराम मंदिर के जेल भरो आंदोलन के दौरान सितंबर 1990 में मुझे व अन्य साथियों को पुलिस ने गुन्नौर से गिरफ्तार कर लिया था। यहां से कारसेवकों को पुलिस ने डंपर में बैठाकर पीलीभीत जेल भेज दिया गया था। जेल में पहुंचने के तीन बाद ही ही वहां कारसेवकों की भीड़ अधिक होने के चलते खाने का अभाव हो गया था।
कारसेवक मणिकांत वार्ष्णेय के मुताबिक श्रीराम मंदिर आंदोलन में बबराला से 17 कारसेवकों की टोली तीन दिसंबर 1992 को ट्रेन से अयोध्या रवाना हुई थी। वहां चार दिसंबर की सुबह अयोध्या पहुंचकर कारसेवकपुरम में रुके थे। दो दिन रामभक्ति में बीते थे। हर ओर जय श्री राम के नारे, प्रभु राम के भजन सुनाई देते थे। छह दिसंबर को रामलला के स्थल पर सभा हुई थी।
उस दिन की पूरी घटना मेरी आंखों के सामने हुई। इसके बाद सात दिसंबर 1992 को रामलला का चबूतरा बनाया जाना था। उस दिन चबूतरे में 11 ईंटें मैंने भी रखी थी। पूरी अयोध्या में दिवाली जैसा उत्सव था। प्रशासन ने सभी को वहां से वापस जाने के निर्देश दिए। हमारी ट्रेन आठ दिसंबर की दोपहर अयोध्या से रवाना हुई थी।
सुरक्षा को लेकर जगह जगह पुलिस, पीएसी तैनात थी। रुकते-रुकते ट्रेन तीन में दस दिसंबर को चंदौसी पहुंची थी। वहां सभी कारसेवक रोडवेज से अपने घर पहुंचे थे। मैं, अन्य साथियों के साथ 1990 में भी पीलीभीत में रह चुका हूं।