28 अगस्त: तत्कालीन डीएम सुरेंद्र कुमार व एसएसपी मंजिल सैनी का आनन-फानन में जिले से ट्रांसफर। नवागत डीएम कौशलराज शर्मा और एसएसपी सुभाषचंद दुबे ने संभाली जिले की कमान।
28 अगस्त: सचिन-गौरव के मलिकपुरा में हुए अंतिम संस्कार से लौटती गुस्साई भीड़ ने कवाल में घुसकर की तोड़फोड़, पथराव और आगजनी।
30 अगस्त: कवाल में हुई तोड़फोड़, आगजनी व पथराव के विरोध में मोहल्ला खालापार में जुमे की नमाज के बाद एक समुदाय के लोगों ने दिया डीएम-एसएसपी को ज्ञापन। सभा में दिए गए भड़काऊ भाषण व हुुई जमकर नारेबाजी।
31 अगस्त: खालापार सभा की प्रतिक्रिया में हिंदूवादी संगठनों ने सिखेड़ा के गांव नंगला मंदौड़ के कॉलेज मैदान में आयोजित की पंचायत।
फिर आगे क्या हुआ-
07 सितंबर: भारतीय किसान यूनियन और हिंदूवादी संगठनों ने बहू-बेटी सम्मान बचाओ महापंचायत का फिर से नंगला मंदौड़ के कॉलेज मैदान में किया आयोजन। प्रशासनिक दबाव में भाकियू ने ऐनवक्त पर खींचा आयोजन से हाथ, लेकिन हिंदूवादी संगठनों और भाजपा नेताओं ने पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत की महापंचायत।
सुबह दस बजे: जिला प्रशासन ने महापंचायत में नंगला मंदौड़ में जाने वाले लोगों को रोकने के प्रयास किए, जो असफल रहे। पूरे जिले से लगातार भीड़ जुटती चली गई, जिसे भांपने में जिले का खुफिया विभाग पूरी तरह से विफल रहा। देखते ही देखते नंगला मंदौड़ महापंचायत में लाखों की भीड़ जुटी, जो हाथों में डंडे व धारदार हथियार लिए हुए थी।
दोपहर एक बजे: शाहपुर क्षेत्र के गांवों से महापंचायत में पहुंचे घायल ग्रामीण। घायलों ने दी शाहपुर के गांव बसीकलां में दूसरे समुदाय की भीड़ द्वारा हमला किए जाने की जानकारी।
दोपहर डेढ़ बजे: महापंचायत में पहुंचे बसीकलां में घायल ग्रामीणों को देखकर फूटा भीड़ का गुस्सा। हालात काबू से बाहर होते देख आनन-फानन में खत्म की गई महापंचायत।
दोपहर दो बजे: महापंचायत से लौटते ग्रामीणों पर गांव जौली में गंगनहर पटरी मार्ग, मंसूरपुर के गांव पुरबालियान, मीरापुर के गांव मुझेड़ा सादात, गांव शेरनगर समेत जिले में विभिन्न मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में किए गए सुनियोजित हमले। शहर में भी पहुंची दंगे की आग, गांव अलमासपुर के बाद मोहल्ला खालापार और मेरठ रोड पर शुरू हुई सांप्रदायिक हिंसा। कई लोगों की हुई मौत, दर्जनों हुए घायल। देर रात तक आते-आते पूरे जिले से हिंसक झड़पों का दौर हुआ शुरू।
आठ सितंबर: महापंचायत से लौटते ग्रामीणों पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया स्वरूप ग्रामीण इलाकों में समुदाय विशेष के लोगों को बनाया गया निशाना। जनपद के साथ ही आसपास के इलाकों में भी फैली हिंसा।
नौ सितंबर: लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए सेना के हवाले किया गया जिला। एक समुदाय के हजारों लोगों ने जान बचाने के लिए घर-बार छोड़कर किया पलायन। देखते ही देखते जिले में कई जगह बने दंगा विस्थापित कैंप।
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