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फौज में मेरी तैराकी आज भी एक यादगार : ले. कर्नल सोही

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मोहाली। 32 साल की अवधि मेरी फौज में पूरी हो चुकी है। 1965 में फौज में आना हुआ। मेरी तैराकी आज भी एक यादगार है। यह मेरी खुशी का राज है। यह बात भारतीय फौज से सेवानिवृत्त हुए लेफ्टिनेंट कर्नल साधु सिंह सोही ने कही।
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1966 में गाजा, यूएई में भूमध्य सागर में संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बलों के हुए रफ सीवाटर स्विमिंग में मैं चैंपियन बना। तब स्थानीय यूएनईएफ की मासिक पत्रिका ने फ्रंट पेज पर कवर किया। पहली बार अखबार में फोटो छपी देखकर भारत के हर नागरिक का सीना चौड़ा हो गया था।
आजादी के अमृत महोत्सव में 75 वर्षों के बाद भी ले. कर्नल सोही का देश के प्रति जुनून और जज्बा देखते बनता है। अपनी सेना में ड्यूटी के दौरान मैं ज्यादातर पहाड़ों, बर्फीले इलाकों और जंगलों में तैनात था जिसका मैंने भरपूर आनंद लिया। मेरा जन्म 8 जनवरी 1945 को पाकिस्तान के गांव सोहियां गुजरांवाला में एक किसान परिवार में हुआ था। विभाजन के समय मेरा परिवार नीलोखेड़ी करनाल, हरियाणा में शिफ्ट हो गया था। वहीं 12वीं तक की पढ़ाई की। उत्कृष्ट तैराक होने के कारण 1964 में स्पोर्ट्स कॉलेज जालंधर में दाखिला लेना पड़ा। अगले साल मुझे लेफ्टिनेंट स्व. ब्रिगेडियर केएस चांदपुरी ने बेहतर कॅरिअर के लिए सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। मैं 6 अगस्त 65 को 3 पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुआ जो मुझे 1965 में यूएनईएफ गाजा, यूएई ले गया। वहां मैंने सीवाटर स्विमिंग चैंपियनशिप में भाग लिया और इसे अच्छे अंतर से लिया।
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श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ चला चार साल ऑपरेशन
भारत वापस आने के बाद मैंने अपने खेल के साथ सेना में कमीशन की तैयारी भी शुरू कर दी। सेना ने मेरी बहुत मदद की। अंत में मैं ऑफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल, ओटीएस, मद्रास में शामिल हो गया और 6 अगस्त 1970 को दूसरा लेफ्टिनेंट बन गया। जम्मू-कश्मीर की सीमाओं में नई इकाई 3 बिहार रेंजिमेंट में शामिल हो गया। वहां मैंने 1971 के युद्ध में सक्रिय अभियानों में भाग लिया। हमने लगभग 9 किलोमीटर पाकिस्तान क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। 1988 में मैं मेजर के रूप में श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ 2 साल तक लड़ा। मैं 1990-92 में चंडी मंदिर में तैनात था जिसने मोहाली में मेरे बच्चों की शिक्षा और घर निर्माण में मदद की। मैं 31 जनवरी 1996 को सेवानिवृत्त हुआ और चंडीगढ़ के एक होटल का जीएम बन गया।
कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा
सेवानिवृत्ति के बाद जल्द ही मुझे अहसास हुआ कि हमारे जवान जेसीओ और विधवाओं की हालत खराब है। मैंने अपने सैनिकों को वापस भुगतान करने के लिए भूतपूर्व सैनिक, ईएसएम, कल्याण गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। इसने मुझे जीवन में बहुत कुछ दिया। मैंने 2002 में अपने एनजीओ ईएसएम शिकायत प्रकोष्ठ को पंजीकृत किया और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वन रैंक वन पेंशन के लिए लड़ी लड़ाई
वन रैंक वन पेंशन के लिए भी पूरी लड़ाई लड़ी। 21 वर्षों में मेरे एनजीओ की मदद से लगभग 400 ईएसएम और विधवाओं को पेंशन मिली है। हमारा रजिस्ट्रेशन शुल्क 10 से अब 20 रुपये हो गया है। हम हमारी सीएसडी कैंटीन के सामने एक पेड़ के नीचे से काम करते हैं। संस्था के लगभग 2300 सदस्य हैं और पूरे भारत में 40 से अधिक ईएसएम संगठन से जुड़े हैं।
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