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नोबेल पुरस्कार विजेता विस्लावा शिम्बोर्स्का की कविता : आकस्मिक मुलाक़ात

अमर शर्मा

Vishwa Kavya
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                                                  आकस्मिक मुलाक़ात 

हम मिले
बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ ।
हमने कहा- कितनी खुशी हुई
आपको इतने सालों बाद देखकर ! 
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पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ ।
घास खा रहा था शेर,
बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी ।
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बंद थे ।

हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे ।
मोरों के पंख झड़ गए थे ।
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में ।
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए । 

असहाय-सी मुस्कान में खो गई
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे ! 

-विस्लावा शिम्बोर्स्का, अनुवाद: विजय अहलूवालिया
5 वर्ष पहले
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