आकस्मिक मुलाक़ात
हम मिले
बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ ।
हमने कहा- कितनी खुशी हुई
आपको इतने सालों बाद देखकर !
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पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ ।
घास खा रहा था शेर,
बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी ।
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बंद थे ।
हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे ।
मोरों के पंख झड़ गए थे ।
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में ।
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए ।
असहाय-सी मुस्कान में खो गई
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे !
-विस्लावा शिम्बोर्स्का, अनुवाद: विजय अहलूवालिया