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बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है

दीपाली अग्रवाल

Viral Kavya
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बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर
क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,
चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना।

ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है
पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्योंकि
एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले।

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एक घड़ी ख़रीदकर हाथ में क्या बाँध ली,
वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे।

सोचा था घर बना कर बैठूँगा सुकून से
पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला।
सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब,
बचपन वाला ‘इतवार’ अब नहीं आता।

शौक तो माँ-बाप के पैसों से पूरे होते हैं,
अपने पैसों से तो बस ज़रूरतें ही पूरी हो पाती हैं।

जीवन की भाग-दौड़ में;
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम,
और
आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है।
कितने दूर निकल गए रिश्तों को निभाते निभाते
खुद को खो दिया हमने अपनों को पाते पाते।



- ये शायरी इंटरनेट की दुनिया में कवि हरिवंश राय बच्चन के नाम से लोकप्रिय है किन्तु यह उनकी लिखी कविता नहीं है।
इनके रचनाकार का नाम पता नहीं चल सका। अगर आपको लेखक का नाम मालूम हो तो ज़रूर बताएं। नाम साझा करने में हमें ख़ुशी होगी।

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