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सोशल मीडिया: वे  महासागर  हमारी प्यास से परिचित नहीं हैं !

काव्य डेस्क

Viral Kavya
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                                                  धूप  में  बादल बनेंगे  यह वचन देकर गए  जो
वे  महासागर  हमारी प्यास से परिचित नहीं हैं !

फूल  उन  पर  चढ़ सकें  
तो बाग हमने नोच डाले,
होम में हम खुद जले  हैं 
तब  गए  उनतक उजाले,

वे  कहाँ  बैठे  हुए  हैं  क्या  कहें  किससे  बताएं
वे समय-स्वामी अगर उपवास से परिचित नहीं हैं !
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राज महलों ने  निकाला 
हम भटकते फिर  रहे हैं,
या   समय   के  फेर  से 
हम उठ रहे हैं गिर रहे हैं,

देखकर ये दृश्य फिर फिर मन हमारा कह रहा है 
आतताई  राम  के  वनवास  से  परिचित  नहीं हैं !

धूल    ने   पर्वत   बनाए  
बूँद  ने   सागर   गढे़   हैं,
पृष्ठ   बीते      काल   के  
इतिहास में सबने पढ़े हैं,

आज लिख दें लोग माथे पर भले आकर पराजय
किंतु क्या वे भी अटल विश्वास से परिचित नहीं हैं !

- ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से साभार
4 वर्ष पहले
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