हम नदी के दो किनारे
जो कभी मिल न सके,
तारे बन टिमटिमाए गगन में
अश्रु बन आंखों से बहे,
मेरे मन की पीर को तुम
एक नया-सा स्वर मुझे दो।
मैं विरह की अनसुनी कहानी
अपने उर में जगह मुझे दे दो,
अश्रुपूरित हैं नयन हमारे
गीत मैं गुनगुना रहा हूं।
आज तक तुमसे जो कहा ना
वो दुनिया को मैं सुना रहा हूं।
~ राकेश धर द्विवेदी
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