मिलती नहीं कहीं भी मगर ढूँढ़ रहे हैं,
सूखी हुई नदी की नहर ढूँढ़ रहे हैं।
मालूम है उड़ने के नहीं आ सकेगा काम,
हम लोग मगर सोने के पर ढूँढ़ रहे हैं।
कागज की एक नाव में बैठे हैं लोग सब,
श्मशान को जाने की डगर ढूँढ़ रहे हैं।
बस्ती के लकड़हारे थके पेड़ काटकर
अब धूप में बैठे हैं, शजर ढूँढ़ रहे हैं।
जो शहर में बैठे हैं वो करते हैं गाँव याद,
जो गाँव में बैठे हैं शहर ढूँढ़ रहे हैं।
रोती है, मुझे डाँट के लगती है आ गले,
बेटी में बूढ़ी माँ की नजर ढूँढ़ रहे हैं।
बाजार से लौट आए थे दस्तार बचाकर,
अब लोग मेरा घर, मेरा सर ढूँढ़ रहे हैं।
साभार: चित्रगुप्त की फेसबुक वाल से
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