यह ऊंट है।
इतिहास में इसकी उपस्थिति
अक्सर दर्ज नहीं की गई
हालांकि कई बार
राजाओं से अधिक भरोसा
इसी पर किया गया।
सन् 1398 में
जब तैमूर दिल्ली की ओर बढ़ रहा था
तुगलक के पास हाथी थे।
विशाल, कवचधारी, भय पैदा करने वाले।
तैमूर जानता था
युद्ध में हमेशा शक्ति नहीं जीतती।
उसने ऊंटों पर
सूखी घास लादी
आग लगाई
और उन्हें हाथियों की ओर हांक दिया।
हाथी डर गए।
इतना ही हुआ।
कई बार इतिहास में
इतना ही काफी होता है।
वे लौटे
और अपनी ही सेना को रौंदते चले गए।
सल्तनत हार गई।
तैमूर जीत गया।
लेकिन इतिहास ने
तैमूर का नाम याद रखा
ऊंटों का नहीं।
यह पहली बार नहीं था।
सायरस भी जानता था
कि युद्ध केवल भुजाओं से नहीं
ज्ञान से जीते जाते हैं।
उसने ऊंटों को आगे किया।
घोड़े उनकी गंध से घबरा गए।
सेना बिखर गई।
एक और विजय
इतिहास में दर्ज हो गई।
फिर वही हुआ।
सायरस याद रहा।
ऊंट नहीं।
इतिहास का यह पुराना स्वभाव है।
वह विजेताओं की सूची बनाता है
उन जीवों की नहीं
जिनकी पीठ पर बैठकर
विजेता वहां तक पहुंचे।
सदियों से ऊंट
मनुष्य का भार उठाता आया है।
रेगिस्तान पार कराता है।
युद्ध पार कराता है।
अकाल पार कराता है।
उसकी आंखों में रेत से बचने की युक्ति है।
उसके शरीर में प्यास से लड़ने की क्षमता।
उसके दूध में
भविष्य की संभावनाएं हैं।
लेकिन हम उसे
सिर्फ एक पशु कहते हैं।
जैसे इतिहास
सिर्फ एक फुटनोट देता है।
आज ऊंट कम हो रहे हैं।
रेगिस्तान अभी बाकी है।
रेत अभी बाकी है।
लेकिन ऊंट कम हो रहे हैं।
यह केवल एक प्रजाति का संकट नहीं है।
यह स्मृति का संकट है।
हम उन चीजों को खोते जा रहे हैं
जिन्होंने हमें बचाए रखा।
और हमेशा की तरह
हम देर से समझेंगे।
इतिहास गवाह है।
मनुष्य ने अक्सर
अपने सहायकों को नष्ट किया है
और फिर उनके बारे में स्मारक बनाए हैं।
संभव है
एक दिन ऊंट भी
स्मारकों में मिलें।
तब इतिहास फिर लिखा जाएगा।
और शायद पहली बार
यह प्रश्न पूछा जाएगा—
रेगिस्तान में
आखिर किसने किसे बचाया था,
मनुष्य ने ऊंट को
या ऊंट ने मनुष्य को?
- अनिका चौधरी
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