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Urdu Ghazal: तस्लीम फ़ाज़ली की ग़ज़ल 'रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामाँ हो गए'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामाँ हो गए


पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए

दिन-ब-दिन बढ़ती गईं उस हुस्न की रानाइयाँ
पहले गुल फिर गुल-बदन फिर गुल-बदामाँ हो गए

आप तो नज़दीक से नज़दीक-तर आते गए
पहले दिल फिर दिल-रुबा फिर दिल के मेहमाँ हो गए

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उनवाँ हो गए
3 वर्ष पहले
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