बस्ती सहरा एक बराबर कर दोगे क्या
बेघर हो तो सब को बेघर कर दोगे क्या
एक ही दुख को इतना रोना ठीक नहीं है
सारे आंसू खर्च उसी पर कर दोगे क्या
गुलशन जो बर्बाद किया है उसकी तलाफी
जूड़े में इक फूल सजा कर कर दोगे क्या
किस को घर की याद नहीं आती है लेकिन
हमसफरों का जीना दूभर कर दोगे क्या
ठीक है हम पर सूट नहीं है टाई नहीं है
कपड़ों पर बारात से बाहर कर दोगे क्या
माना हम ने अच्छा समझाते हो लेकिन
बातों से हालात को बेहतर कर दोगे क्या
साभार: शारिक़ कैफ़ी की फेसबुक वाल से
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से
https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o