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Urdu Poetry: उबैदुल्लाह अलीम की ग़ज़ल- कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया 
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझ को मार दिया 

इक सब्ज़ शाख़ गुलाब की था इक दुनिया अपने ख़्वाब की था 
वो एक बहार जो आई नहीं उस के लिए सब कुछ हार दिया 

ये सजा-सजाया घर साथी मिरी ज़ात नहीं मिरा हाल नहीं 
ऐ काश कभी तुम जान सको जो इस सुख ने आज़ार दिया 

मैं खुली हुई इक सच्चाई मुझे जानने वाले जानते हैं 
मैं ने किन लोगों से नफ़रत की और किन लोगों को प्यार दिया 

वो इश्क़ बहुत मुश्किल था मगर आसान न था यूँ जीना भी 
उस इश्क़ ने ज़िंदा रहने का मुझे ज़र्फ़ दिया पिंदार दिया 
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मैं रोता हूँ और आसमान से तारे टूटते देखता हूँ 
उन लोगों पर जिन लोगों ने मिरे लोगों को आज़ार दिया 

वो यार हों या महबूब मिरे या कभी कभी मिलने वाले 
इक लज़्ज़त सब के मिलने में वो ज़ख़्म दिया या प्यार दिया 

मिरे बच्चों को अल्लाह रखे इन ताज़ा हवा के झोंकों ने 
मैं ख़ुश्क पेड़ ख़िज़ाँ का था मुझे कैसा बर्ग-ओ-बार दिया 
2 वर्ष पहले
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