विज्ञापन

निदा फ़ाज़ली: जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं
जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं

आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है
हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं

जब भी कोई तख़्त सजा है मेरा तेरा ख़ून बहा है
दरबारों की शान-ओ-शौकत मैदानों की शमशीरें हैं

हर जंगल की एक कहानी वो ही भेंट वही क़ुर्बानी
गूँगी बहरी सारी भेड़ें चरवाहों की जागीरें हैं
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।   
11 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all