1-
इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ
मुफ़्लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ
जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ
क़िंदील समझ कर कोई सर काट न ले आए
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ
सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे
मैं वक़्त के शो-केस में चुप-चाप खड़ा हूँ
वो आइना हूँ जो कभी कमरे में सजा था
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ
दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझ से
मैं ख़ाक हूँ मैं आग हूँ पानी हूँ हवा हूँ
मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया
सिर्फ़ इस लिए क़तरा हूँ कि दरिया से जुदा हूँ
हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराज-ए-मोहब्बत
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ
दुनिया से निराली है 'नज़ीर' अपनी कहानी
अँगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ
2-
हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते
हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते
उन्हें ख़ुदा न बनाते तो और क्या करते
बग़ैर इश्क़ अँधेरे में थी तिरी दुनिया
चराग़-ए-दिल न जलाते तो और क्या करते
हमें तो उस लब-ए-नाज़ुक को देनी थी ज़हमत
अगर न बात बढ़ाते तो और क्या करते
ख़ता कोई नहीं पीछा किए हुए दुनिया
जो मय-कदे में न जाते तो और क्या करते
अंधेरा माँगने आया था रौशनी की भीक
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते
किसी से बात जो की है तो वो ख़फ़ा हैं 'नज़ीर'
किसी को दोस्त बनाते तो और क्या करते
एक वर्ष पहले