विज्ञापन

Social Media Poetry: सबको ख़ुद सा समझने की आदत

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            सबको ख़ुद सा समझने की आदत 
        
                                                    
                            
हममें है एक ये बुरी आदत 

झट से कर लेते थे यक़ीं सब पर
ठोकरों ने सुधार दी आदत 

एक दम से तो ये न छूटेगी 
रफ़्ता रफ़्ता ही जाएगी आदत 

बात मनवा के अपनी दम लेना 
अब कहाँ हममें ये रही आदत 

बे सबब बात बात पर ग़ुस्सा 
दुश्मने-जां है ये तेरी आदत 

मैं किसी पर पलट के वार करूँ 
ये तो है ही नहीं मेरी आदत 

इक अजब सा सुकून है जब से 
ख़ुद में रहने की डाल ली आदत 

शाइरी शौक़ थी मेरा पहले 
जाने कब कैसे बन गई आदत 

लग गई एक बार तो ‘मधुमन’ 
छूटती कब है फिर कोई आदत 

साभार: मधु मधुमन की फेसबुक वाल से  

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12479 कविताएं

View Profile

Ramesh Raj

25 कविताएं

View Profile