लाख ग़म सीने से लिपटे रहे नागन की तरह
प्यार सच्चा था महकता रहा चंदन की तरह
तुझ को पहचान लिया है तुझे पा भी लूँगा
इक जनम और मिले गर इसी जीवन की तरह
अब कोई कैसे पहुँच पाएगा तेरे ग़म तक
मुस्कुराहट की रिदा डाल दी चिलमन की तरह
कोई तहरीर नहीं है जिसे पढ़ ले कोई
ज़िंदगी हो गई बे-नाम सी उलझन की तरह
जैसे धरती की किसी शय से त'अल्लुक़ ही नहीं
हो गया प्यार तिरा भी तिरे दामन की तरह
शाम जब रात की महफ़िल में क़दम रखती है
भरती है माँग में सिंदूर सुहागन की तरह
मुस्कुराते हो मगर सोच लो इतना ऐ 'नूर'
सूद लेती है मसर्रत भी महाजन की तरह
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