विज्ञापन

कौसर नियाज़ी: चंद लम्हों के लिए एक मुलाक़ात रही

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


चंद लम्हों के लिए एक मुलाक़ात रही
फिर न वो तू न वो मैं और न वो रात रही

कुर्रा-ए-अर्ज़ ने देखा ही न था वो ख़ुर्शीद
जिस की गर्दिश में शब ओ रोज़ मिरी ज़ात रही

अब तो हर शख़्स उजालों में खड़ा है उर्यां
कौन सी शक्ल पस-ए-पर्दा-ए-ज़ुल्मात रही

सर्द-मेहरी मिरे लहजे में भी होगी लेकिन
तुझ में ख़ुद भी तो न पहली सी कोई बात रही

हाल-ए-दिल उस को सुना कर है बहुत ख़ुश 'कौसर'
लेकिन अब सोच ज़रा क्या तिरी औक़ात रही
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all