विज्ञापन

Kaifi Azmi Poetry: कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल 'यूँही कोई मिल गया था सर-ए-राह चलते चलते'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


यूँही कोई मिल गया था सर-ए-राह चलते चलते
वहीं थम के रह गई है मिरी रात ढलते ढलते

जो कही गई है मुझ से वो ज़माना कह रहा है


कि फ़साना बन गई है मिरी बात टलते टलते

शब-ए-इंतिज़ार आख़िर कभी होगी मुख़्तसर भी


ये चराग़ बुझ रहे हैं मिरे साथ जलते जलते


3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all