विज्ञापन

Urdu Poetry: कैफ़ी आज़मी की नज़्म 'कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है


वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ है
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँ है
दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई
इस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँ है
तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है 

2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all