विज्ञापन

हसीब सोज़: इतनी सी बात थी जो समन्दर को खल गई

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            इतनी सी बात थी जो समन्दर को खल गई 
        
                                                    
                            
काग़ज़ की नाव कैसे भँवर से निकल गई ।

पहले ये पीलापन तो नहीं था गुलाब में,
लगता है अबके गमले की मिट्टी बदल गई ।

फिर पूरे तीस दिन की रियासत मिली उसे,
फिर मेरी बात अगले महीने पे टल गई ।

इतना बचा हूँ जितना तेरे *हाफ़ज़े में हूँ,
वर्ना मेरी कहानी मेरे साथ जल गई ।

दिल ने मुझे मुआफ़ अभी तक नहीं किया,
दुनिया की राय दूसरे दिन ही बदल गई ।

*हाफ़ज़े-यादाश्त

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile