जिन को नींदों की न हो चादर नसीब
उन से ख़्वाबों का हसीं बिस्तर न माँग
~ ताहिर फ़राज़
नींद आँख में भरी है कहाँ रात भर रहे
किस के नसीब तुम ने जगाए किधर रहे
~ लाला माधव राम जौहर
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नींद आती है अगर जलती हुई आँखों में
कोई दीवाने की ज़ंजीर हिला देता है
~ शहज़ाद अहमद
टूटती रहती है कच्चे धागे सी नींद
आँखों को ठंडक ख़्वाबों को गिरानी दे
~ ज़ेब ग़ौरी
तन्हाई से आती नहीं दिन रात मुझे नींद
या-रब मिरा हम-ख़्वाब ओ हम-आग़ोश कहाँ है
~ शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अब आओ मिल के सो रहें तकरार हो चुकी
आँखों में नींद भी है बहुत रात कम भी है
~ निज़ाम रामपुरी
भरी रहे अभी आँखों में उस के नाम की नींद
वो ख़्वाब है तो यूँही देखने से गुज़रेगा
~ ज़फ़र इक़बाल
कैसा जादू है समझ आता नहीं
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के
~ इब्न-ए-मुफ़्ती
नींद भी जागती रही पूरे हुए न ख़्वाब भी
सुब्ह हुई ज़मीन पर रात ढली मज़ार में
~ आदिल मंसूरी
नींद को लोग मौत कहते हैं
ख़्वाब का नाम ज़िंदगी भी है
~ अहसन यूसुफ़ ज़ई