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Happy Republic Day 2024: नज़ीर बनारसी- आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी 
आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी 

सर पर बसंत घास ज़मीं पर हरी हरी 
फूलों से डाली डाली चमन की भरी भरी 
आई न तू तो सब की सुनूँगा खरी खरी 
तुझ बिन उदास है मिरी खेती हरी-भरी 
आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी 

घूँघट उलट रही है चमन की कली कली 
शाख़ें तो टेढ़ी-मेढ़ी हैं सूरत भली भली 
रंगीनियाँ हैं बाग़ में ख़ुशबू गली गली 
शबनम से है कली की पियाली भरी भरी 
आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी 

मुस्का रही है मुझ पे मिरे बाग़ की कली 
आँखें दिखा रही है मुझे कल की छोकरी 
ऐसा न हो कि फूल उड़ाएँ मिरी हँसी 
अब तैरने लगी मिरी आँखों में जल-परी 
आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी 
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काँटे हों चाहे फूल हों फ़स्ल-ए-बहार के 
पाले हैं दोनों एक ही पर्वरदिगार के 
हम भारती शिकार हैं अपने ही वार के 
ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी 
धरती पे आ कि आ गई छब्बीस जनवरी 
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