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गुलशन मेहरा की ग़ज़ल: कही कुछ और जाती है बताई और जाती है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            कही कुछ और जाती है बताई और जाती है
        
                                                    
                            
कहानी और होती है सुनाई और जाती है

ये इक तरफ़ मोहब्बत इक जुआ है इस में भी क़िस्मत
मुसलसल हारने पर आज़माई और जाती है

तुम्हें जो बात बतलाना मुझे बेहद ज़रूरी है
न जाने क्यों तुम्हीं से ही छुपाई और जाती है

अभी तुम को कुछ आदाब-ए-मोहब्बत सीखने होंगे
नज़र हर बार मिलने पर चुराई और जाती है

वो जो हाकिम दिखाता है ना मुस्तक़बिल की इक तस्वीर
दिखाई और जाती है बनाई और जाती है

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एक महीने पहले
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