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गुलशन मदान: ज़िंदगी में ग़म अगर आया नहीं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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ज़िंदगी में ग़म अगर आया नहीं
समझो जीने का हुनर आया नहीं

कब से है सूरज सफ़र में रात दिन
आज तक पर उस का घर आया नहीं

शहर से गुज़रा तो वो घर आएगा
उस का वा'दा था मगर आया नहीं

लौ बुझी आख़िर सहर भी हो गई
आने वाला रात भर आया नहीं

जब मिली 'गुलशन' अचानक रौशनी
देर तक कुछ भी नज़र आया नहीं
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19 घंटे पहले
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