क़रीबन हैं जहां में सात बिलियन
मगर तेरी कमी तेरी कमी है
मैंने उसको इतना देखा, जितना देखा जा सकता था
लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था
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किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं
अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ
इत्र मिट्टी का लगाया चाहिए पोशाक में
ख़ाक से रग़बत रहे मिलना है इक दिन ख़ाक में
आप आए तो बहारों ने लुटाई ख़ुश्बू
फूल तो फूल थे काँटों से भी आई ख़ुश्बू
लोग काँटों से बच के चलते हैं
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं
- अज्ञात
मुस्कुराने का यही अंदाज़ था
जब कली चटकी तो वो याद आ गया
- अज्ञात
ख़ामुशी से हज़ार ग़म सहना
कितना दुश्वार है ग़ज़ल कहना
कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए
ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए