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Urdu Poetry: साँप भी बीन भी मदारी भी

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            साँप भी बीन भी मदारी भी
        
                                                    
                            
हाए क्या बात है तुम्हारी भी

कैसे करते हो यार माइक पर
शा'इरी भी दुकान-दारी भी

हम वली तो नहीं ख़ुदा से मगर
जान-पहचान है हमारी भी

सिर्फ़ दिल का मु'आमला ही नहीं
'इश्क़ है एक ज़िम्मे-दारी भी

हार कर फूल तेरी ख़ुश्बू से
ढूँढ़ लेते हैं रिश्तेदारी भी

वो जो पिछली क़तार में ख़ुश था
आ गई आज उस की बारी भी

हम कभी एक साथ करते थे
ख़ाकसारी भी शह-सवारी भी

आप ख़ामोशियाँ भी सुनते हैं
आह सुन लीजिए हमारी भी

~ फ़हमी बदायूनी

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